पागलों की कमी नहीं ग़ालिब < > एक ढूँढो हज़ार मिलते हैं
२१ अक्तूबर को 'आज तक 'टी वी चैनल ने एक अजीबोगरीब चीज़ दिखाई , एक साधू बाबा का दावा है की उनके पेट मैं छ महीने का बच्चा है , और वह प्र्ग्नेंट हैं ,उनका दावा है की वः तीन महीने बाद एक बच्चे को जन्म देंगें ,खास बात यह हे कि टीवी वालों ने बाबा के पेट की मेडिकल जाँच कराइ तो उस में कुछ न था परन्तु बाबा फिर भी पूरे धड़ल्ले से कह रहे थे की वः पेट से हें ,और उनके पेट में छ महीने का शिशु है जो मेडिकल मशीनों की पकड़ में नहीं आसकता,टीवी वालों ने डाक्टरों को बुलाया और महाराज को और डाक्टरों को आमने सामने बिठाकर इस विषय पर चर्चा की ,डाक्टरों का कहना था की बाबा जो कुछ कह रहे हैं वह एक असंभव ,और निराधार बात हे , ऐसा होना मुमकिन ही नहीं परन्तु बाबा बराबर यह दावा किये जा रहे थे कि ,नहीं , वह हमल से हैं , डाक्टरों का कहना था कि बाबा के बेत पर चर्बी बढ़ी हुई हे ,जिस कारन उनका पेट बड़ा दिख रहा हे ,तो दूसरी ओर बाबा का कहना था कि उनको गर्भवती महिला जैसा दर्द भी महसूस होता ,गर्भवती महिला कि भांति ही जी मत्लाता हे , और वह सोपर्तिशत गर्भवती हें ,जो तीन महीने बाद मन बन जाएगें ,और जिस बच्चे को वह जन्म देंगें ,वह अवतार होगा ,यहाँ आकर बाबा के दावे कि गिरः खुलती हे ,आज कल हिन्दू धर्म गरुओं के सर पर चमत्कारों का बड़ा भूत सवार हे ,यह लोग झूठे चमत्कार दिखाकर आम जनता को ठगते हैं ,'आज तक 'ने कई बार इस्तिंग आपरेशन करने ऐसे बाबाओं को नग्गा कर लिया हे ,परन्तु इन बाबाओं को शर्म नहीं आती , इस लिए आम आदमी को इन से होश्यार रहने कि जरूरत है ,
Monday, October 25, 2010
Wednesday, October 20, 2010
इक़बाल का कलाम एक शायर की लफ्फाजी हे
अनवर जमाल जी
आप के ब्लोग पर आपका लेख अल्लामा इकबाल की नज़्म के हवाले से पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ ,ठीक हे की सर इक़बाल ने राम को इमाम ए हिंद कहा हे ,ग़ालिब अगर शराब की तारीफ करे तो शराब कोई अच्छी चीज़ नहीं बन जा एगी , इक़बाल का कलाम एक शायर की लफ्फाजी हे तो आप की बातें केवल चापलोसीऔर तुष्टिकरण के सिवा कुछ नहीं ,अल्लामा इक़बाल ने राम को इमाम ए हिंद कहा हे तो आज बहुत से तताकथित राम भक्त राम को आदर्श बतलाते हैं ,लेकिन इन में से कोई यह नहीं बतलाता की राम आदर्श केसे हें ? उनकी कोनसी बात को आज यह लोग आदर्श बना सकते हें? क्या यह लोग बता सकते हें की राम राज्य में जो वर्ण व्यवस्था थी और एक शूद्र को धर्म कार्य करने की भी अनुमति नहीं थी ,क्या यह व्यवस्था आज के समय में आदर्श हो सकती हे ? या राम ने अपनी पत्नी की अग्नि परीक्षा लेने के बाद भी उसे घर से निकाल दिया था ,यह बात आदर्श हो सकती हे ? यह वह शिकार खेलते और हर्द्याविनोद की खातिर भी हिरन आदि को मारते फिरते थे यह बात आदर्श हो सकती हे ?या जब शूर्पनखा उनके पास शादी का प्रस्ताव लेकर आई और उन्हों ने झूट बोलते हुए कहा कि मेरे छोटे भाई की शादी नहीं हुई हे तुम उन से शादी का प्रस्ताव रखो ,जब कि उनके इस छोटे भाई कि शादी भी राम के विवाह के साथ ही हो गई थी , तो क्या यह झूट आदर्श हो सकता हे ? या उस भाई को एक मामूली बात पर घर से निकाल देना आदर्श हो सकता हे जिसने जीवन भर अपना सुख त्याग कर राम की सेवा की ,,,,,,,,सोचो आखिर कब सोचोगे ,,,
Sunday, September 5, 2010
यह हे इन की भाषाशैली
मैं एक मुसलमान हूँ और मेरा परयास रहता हे कि इस्लाम के सम्बन्ध में फैली गलतफहमियों को दूर करूँ , क्यों कि इन गलतफहमियों के कारण नफरतें बढती हें ,जो समाज में दूर्याँ बढाती हें, मेरा परयास रहता हे कि गैर मुलिम भाइयों को इस्लाम के सम्बन्ध में जो एतराजात हें उन्हें दूर किया जाए , जो मुस्लमान होने के नाते मै अपनी ज़िम्मेदारी समझता हूँ ,परन्तु अजीब बात हे कि यहाँ कुछ ऐसे देशबंधु भी हें जिन्हें हर इस्लाम की बात मे पाकिस्तान नज़र आता हे ,और हर इस्लाम की बात करने वाला या इस्लाम पर एतराजों का जवाब देनेवाला पकिस्तान का एजेंट , यह लोग कितने सब्भ्य हें कितने महान विचारों के हें , इनकी भाषाशैली कितने ऊँचे पैमाने की हे क्या आप उसकी एक झलक देखना चाहेंगें ? अगर हाँ तो आइये में आप को एक महान बंधू से मिलवाता हूँ ,जिन्होंने मेरे ब्लॉग पर मेरे एक लेख पर टिपप्णी करते हुए क्या क्या लिखा हे ,उसे पढ़ये , और अंदाज़ा कीजिये की जब आदमी के पास जवाब नहीं होता और हटधर्मी उसकी घुट्टी मे पड़ी होती हे तो वह कितनी घटया मानसिकता का परिचय देसकता हे ,,
Friday, August 6, 2010
छद्म नाम धारी सय्यद हुसैन जी
छद्म नाम धारी सय्यद हुसैन जी
आज दो दिन बाद कम्प्युटर खोला तो आप की गाल्यों का तोहफा नज़र नवाज़ हुआ , आप गलियां दीजिये और जी भर कर दीजिये , मैं भी आप के हक मैं हिदायत की दुआ करने से थका नहीं हूँ ,
दूसरी बात जो बड़े तम तराक से आप ने कही हे , की अरविन्द मिश्रा आदि के सवाल सुन कर माँ क्यों मर गयी , तो मेरे प्यारे उस की वजह यह थी कि ,,,,,, गम और भी हें ज़माने में मुहब्बत के सिवा ,,,मैं दो दिन के लिये दिल्ली चला गया था ,,जहा ५ अगस्त को इंडिया इंटरनेश्नल कल्चरल सेंटर में होने वाली एक कांफ्रेंस में मुझे सम्मलित होना था , वापस हुआ तो आप की गलियों के पत्थर नज़र आये और साथ में उक्त चेलेंज भी,,,,,
प्यारे छद्म नाम धारी ,,,,
यह कोन बड़ी बात अरविन्द भाई ने कहदी ,,मैंने अल्लाह के अस्तित्व पर कुछ बोद्धिक तर्क दिए थे ,, जब कि उन्हों ने बिना तर्क दिए ही ,,, प्रश्न कर डाला कि ,,, अब बोलो , राम हे कि नहीं ,, उन्हों ने कहा हे कि जैसे करोंड़ों मुसलमानों के लिए अल्लाह मियां हे वैसे ही ,,,,करोंड़ों के लिए राम हे ,, यह आस्था की बात हे ,, क्या यह कोई तर्क हुआ,,, ?,,, क्या बुद्धि धारी प्राणी ,हज़रत ए इन्सान इश्वर और अपने पालनहार के सम्बन्ध में इतना गैर जिम्मे दार हे कि बिना सोचे समझे , और यह देखे बिना ही कि जिस वस्तु से मैं आस्था जोड़ रहा हूँ ,,उस का अस्तित्व भी हे कि नहीं , ? ,, ऐसे ही कहीं भी अपनी आस्था को कुर्बान कर देता हे ,,, ?,,
अरविन्द जी कहते हें कि जेसे अल्लाह हे वेसे राम हे ,, यानि,,,, चे निस्बते खाक ब आसमान ए पाक ,,,,हमने अल्लाह से आस्था सोच समझ कर जोड़ी हे ,,अल्लाह से मुराद हम इंसानों जैसा कोई वजूद नहीं ,, अपितो वः सर्व शक्तिमान अस्तित्व हे जो यूनिक हे , जो सर्वत्र , निरपेक्ष और सर्वधार हे ,जो न पैदा होता हे और न ही मरता हे ,,जो न कसी से जना जाता हे और न कसी को जनता हे ,,और सारी बातों की एक बात कि ,,,, उस के जैसा कुछ भी नहीं ,, देखें ,,, (कुरान , सूरह इखलास )
आइये अब इस का जायजा लें कि आपने बिना सोचे समझे अपनी आस्था को कहाँ जोड़ लिया ,,,
सर्व्पर्थम हम आप की बात बड़ी करते हें,, और मानते हें कि राम का अस्तित्व हे ,(यों भी हमें कोई जिद नहीं हे राम को नकारने की ,यह बिंदु आपका पर्सनल हे , हम ने जो कुछ लिखा था ,,वः हमारी नहीं कुछ हिन्दू (क्रोनानिधि आदि) विद्द्वानों का मत था) ,,,
राम थे , ५ ,६ लाख वर्ष पहले अयोद्ध्या के राजा दशरथ के घर में श्रंग्गी ऋषि द्वारा पुत्रोष्टि yag करने पर ( जब दशरथं अपनी तीनों पत्नियों को गर्भवती करने में नाकाम रहे उक्त ऋषि दुवारा गर्भ धारण करके पैदा हुए थे , अर्थात वः दशरथ की पारम्परिक संतान नहीं थे, उनको उनके पिता ने अपनी एक पत्नी के कहने पर देश नीकला दे दिया था , कहते हें की उन्हों ने अपना प्रण पूरा किया था , ( यहाँ में आप को इस्लामी सिद्धांत बताता चलूं ,,वः यह की अगर कहीं पर किसी की हक तलफी हो रही हो तो एसा प्रण पूरा नहीं किया जाएगा ,, और गलत प्रण लेने का कफ्फारा (प्रायश्चित) अदा किया जाएगा ) खैर ,, राम बाप के आदेशानुसार जंगल को चले गए , वहाँ उन पर रावण की बहिन सूर्पनखा मोहित हो गयी , और उसने राम से शादी का प्रस्ताव रख दिया ,,राम ने कहा की मैं तो शादी शुदा हूँ , तुम मेरे छोटे भाई लक्ष्मण से पूछ लो उस की शादी नहीं हुयी हे , जब की राम के साथ ही सीता की बहिन से लक्ष्मण की भी शादी हो गयी थी ,, अर्थात एक ओर तो राम ने झूट बोला , दूसरी ओर लक्ष्मण को कहला भेजा कि जब सूर्पनखा तुम्हारे पास आए तो उस के नाक कान काटले ,, यह प्यार का कैसा बदला था , ? , आप लोग कहते हें कि हर किर्या की प्रति किर्या होती हे , जैसे गोधराकांड में हुयी थी,, तो वेसे ही राम की किर्या पर भी हुयी,, और जब रावण ने अपनी बहिन का यह हल देखा तो वःभिक्षु के भेस में आकर सीता को उठा ले गया , उस समय राम शिकार पर थे , यानि एक ओर जीव हत्या की मनाही,, दूसरी ओर राम भी शिकार करते थे , केवल राम ही नहीं राम के माने हुए पिता दशरथ ने तो हिरन सकझ्कर आज्ञाकारी शरवन को ही क़त्ल कर डाला था ,,
खैर सीताजी चोरी हो गयी तो राम का परेशान होजाना स्वभाविक था बेचारे परेशान हो गये और जंगल गंगल पेड़ पोदों से , आकाश और सितारों से और जंगल की हर्नियों से सीता का पता पूछते फिरे ,, आखिर कार उन्हें पता चल ही गया कि उनकी पत्नी को रावण दुष्ट उठा ले गया हे , तो अब सीता माता को छुडाने की फ़िक्र हुयी , सब से पहले उन्हों ने सुग्रीव से दोस्ती की और उसके भाई बाली का धोके से वध करके उक का राज्य और उसकी पत्नी सुग्रीव के हवाले कर दिया , और सुग्रीव के सेना पति हनुमान को साथ लेकर ( जो असल सुग्रीव के सेना पति थे और अपने स्वामी सुग्रीव की सुरक्षा करने में असमर्थ रहे थे )लंका पर चढाई करदी , और रावण को मार कर ( वः भी उसके भाई कुम्भकरण की गद्दारी से उसे राज काज देने का लालच देकर सीता जी को छुड़ा लाए ,, और उस बेचारी की अग्नि परीक्षा ली , इस के बावजूद एक धोबी के ताना देने पर उसे घर से निकाल दिया , और उसे गर्भवती होने के बजूद जंगल में छुडवा दिया , फिर लक्ष्मण जो पग पग पर भाई के सामने हाथ जोड़े खड़ा रहा उस के साथ क्या सलूक किया ,उसे आप जानते ही होंगे ,, आखिर कार सीता बेचारी तो जमीन से निकली थी उसी में समां गयी ,, श्री राम ने भी अपने तईं सजू नदी के हवाले करके अपनी जान देदी ,,
यह थे श्री राम जिन में छद्मनाम धारी जी आप की एसी ही आस्था हे जैसे करोड़ों मुसलमानों की उस ईश्वर , सर्वशक्तिमान अल्लाह में जो यूनिक हे ,जिसे किसी ने न तो जना हे ,और न वः किसी से जना गया हे ,, और उस के जैसा कुछ भी नहीं ,,
अंत में अनवर जमाल के उस सवाल का जवाब भी ज़रूरी हे जिस में उन हों ने कहा हे कि राम , और दशरत के पुत्र राम चन्द्र को गुड मुड़ न करें , मुझे बताइए कि यह अलग से केवल राम कहाँ से आ गया , ? ,, जिस राम की राम लीला मनाई जाती हे जो बाल्मीकि के द्वारा रामायण में वर्णित हे ,, क्या उस के आलावा भी कोई राम हे ? ,,अगर हे तो वः केवल आप कि घडी मढ़ी आस्था से नहीं होगा उस का हवाला दीजिये ,,यह तो ऐसी ही बात हुयी जैसे आज कल कुछ लोग शिर्डी वाले बाबा का मंदिर बना कर उन की मूर्ती को पूज रहे हें, अब अगर उन को कोई यह कहने लगे कि भाई ,,, शिर्डी वाले की मूर्ती को मत पूजो ,इस में कुछ नहीं ,, तो वः कहे कि ,, शिर्डी वाले पीर और उन की मूर्ती को गुड मुड मत करये,, शिर्डी वाले पीर एक व्यक्ति थे और उनकी मूर्ती ईश्वर हे ,, तो छद्मनाम धारी भाई,, इस फलसफे को तो बस आप सझेंऔर या फिर अनवर जमाल समझे ,, हम तो आप के लिए अल्लाह से दुआ करते हें कि वः आप को और हम सब को सीधी और सच्ची राह दिखाए
आज दो दिन बाद कम्प्युटर खोला तो आप की गाल्यों का तोहफा नज़र नवाज़ हुआ , आप गलियां दीजिये और जी भर कर दीजिये , मैं भी आप के हक मैं हिदायत की दुआ करने से थका नहीं हूँ ,
दूसरी बात जो बड़े तम तराक से आप ने कही हे , की अरविन्द मिश्रा आदि के सवाल सुन कर माँ क्यों मर गयी , तो मेरे प्यारे उस की वजह यह थी कि ,,,,,, गम और भी हें ज़माने में मुहब्बत के सिवा ,,,मैं दो दिन के लिये दिल्ली चला गया था ,,जहा ५ अगस्त को इंडिया इंटरनेश्नल कल्चरल सेंटर में होने वाली एक कांफ्रेंस में मुझे सम्मलित होना था , वापस हुआ तो आप की गलियों के पत्थर नज़र आये और साथ में उक्त चेलेंज भी,,,,,
प्यारे छद्म नाम धारी ,,,,
यह कोन बड़ी बात अरविन्द भाई ने कहदी ,,मैंने अल्लाह के अस्तित्व पर कुछ बोद्धिक तर्क दिए थे ,, जब कि उन्हों ने बिना तर्क दिए ही ,,, प्रश्न कर डाला कि ,,, अब बोलो , राम हे कि नहीं ,, उन्हों ने कहा हे कि जैसे करोंड़ों मुसलमानों के लिए अल्लाह मियां हे वैसे ही ,,,,करोंड़ों के लिए राम हे ,, यह आस्था की बात हे ,, क्या यह कोई तर्क हुआ,,, ?,,, क्या बुद्धि धारी प्राणी ,हज़रत ए इन्सान इश्वर और अपने पालनहार के सम्बन्ध में इतना गैर जिम्मे दार हे कि बिना सोचे समझे , और यह देखे बिना ही कि जिस वस्तु से मैं आस्था जोड़ रहा हूँ ,,उस का अस्तित्व भी हे कि नहीं , ? ,, ऐसे ही कहीं भी अपनी आस्था को कुर्बान कर देता हे ,,, ?,,
अरविन्द जी कहते हें कि जेसे अल्लाह हे वेसे राम हे ,, यानि,,,, चे निस्बते खाक ब आसमान ए पाक ,,,,हमने अल्लाह से आस्था सोच समझ कर जोड़ी हे ,,अल्लाह से मुराद हम इंसानों जैसा कोई वजूद नहीं ,, अपितो वः सर्व शक्तिमान अस्तित्व हे जो यूनिक हे , जो सर्वत्र , निरपेक्ष और सर्वधार हे ,जो न पैदा होता हे और न ही मरता हे ,,जो न कसी से जना जाता हे और न कसी को जनता हे ,,और सारी बातों की एक बात कि ,,,, उस के जैसा कुछ भी नहीं ,, देखें ,,, (कुरान , सूरह इखलास )
आइये अब इस का जायजा लें कि आपने बिना सोचे समझे अपनी आस्था को कहाँ जोड़ लिया ,,,
सर्व्पर्थम हम आप की बात बड़ी करते हें,, और मानते हें कि राम का अस्तित्व हे ,(यों भी हमें कोई जिद नहीं हे राम को नकारने की ,यह बिंदु आपका पर्सनल हे , हम ने जो कुछ लिखा था ,,वः हमारी नहीं कुछ हिन्दू (क्रोनानिधि आदि) विद्द्वानों का मत था) ,,,
राम थे , ५ ,६ लाख वर्ष पहले अयोद्ध्या के राजा दशरथ के घर में श्रंग्गी ऋषि द्वारा पुत्रोष्टि yag करने पर ( जब दशरथं अपनी तीनों पत्नियों को गर्भवती करने में नाकाम रहे उक्त ऋषि दुवारा गर्भ धारण करके पैदा हुए थे , अर्थात वः दशरथ की पारम्परिक संतान नहीं थे, उनको उनके पिता ने अपनी एक पत्नी के कहने पर देश नीकला दे दिया था , कहते हें की उन्हों ने अपना प्रण पूरा किया था , ( यहाँ में आप को इस्लामी सिद्धांत बताता चलूं ,,वः यह की अगर कहीं पर किसी की हक तलफी हो रही हो तो एसा प्रण पूरा नहीं किया जाएगा ,, और गलत प्रण लेने का कफ्फारा (प्रायश्चित) अदा किया जाएगा ) खैर ,, राम बाप के आदेशानुसार जंगल को चले गए , वहाँ उन पर रावण की बहिन सूर्पनखा मोहित हो गयी , और उसने राम से शादी का प्रस्ताव रख दिया ,,राम ने कहा की मैं तो शादी शुदा हूँ , तुम मेरे छोटे भाई लक्ष्मण से पूछ लो उस की शादी नहीं हुयी हे , जब की राम के साथ ही सीता की बहिन से लक्ष्मण की भी शादी हो गयी थी ,, अर्थात एक ओर तो राम ने झूट बोला , दूसरी ओर लक्ष्मण को कहला भेजा कि जब सूर्पनखा तुम्हारे पास आए तो उस के नाक कान काटले ,, यह प्यार का कैसा बदला था , ? , आप लोग कहते हें कि हर किर्या की प्रति किर्या होती हे , जैसे गोधराकांड में हुयी थी,, तो वेसे ही राम की किर्या पर भी हुयी,, और जब रावण ने अपनी बहिन का यह हल देखा तो वःभिक्षु के भेस में आकर सीता को उठा ले गया , उस समय राम शिकार पर थे , यानि एक ओर जीव हत्या की मनाही,, दूसरी ओर राम भी शिकार करते थे , केवल राम ही नहीं राम के माने हुए पिता दशरथ ने तो हिरन सकझ्कर आज्ञाकारी शरवन को ही क़त्ल कर डाला था ,,
खैर सीताजी चोरी हो गयी तो राम का परेशान होजाना स्वभाविक था बेचारे परेशान हो गये और जंगल गंगल पेड़ पोदों से , आकाश और सितारों से और जंगल की हर्नियों से सीता का पता पूछते फिरे ,, आखिर कार उन्हें पता चल ही गया कि उनकी पत्नी को रावण दुष्ट उठा ले गया हे , तो अब सीता माता को छुडाने की फ़िक्र हुयी , सब से पहले उन्हों ने सुग्रीव से दोस्ती की और उसके भाई बाली का धोके से वध करके उक का राज्य और उसकी पत्नी सुग्रीव के हवाले कर दिया , और सुग्रीव के सेना पति हनुमान को साथ लेकर ( जो असल सुग्रीव के सेना पति थे और अपने स्वामी सुग्रीव की सुरक्षा करने में असमर्थ रहे थे )लंका पर चढाई करदी , और रावण को मार कर ( वः भी उसके भाई कुम्भकरण की गद्दारी से उसे राज काज देने का लालच देकर सीता जी को छुड़ा लाए ,, और उस बेचारी की अग्नि परीक्षा ली , इस के बावजूद एक धोबी के ताना देने पर उसे घर से निकाल दिया , और उसे गर्भवती होने के बजूद जंगल में छुडवा दिया , फिर लक्ष्मण जो पग पग पर भाई के सामने हाथ जोड़े खड़ा रहा उस के साथ क्या सलूक किया ,उसे आप जानते ही होंगे ,, आखिर कार सीता बेचारी तो जमीन से निकली थी उसी में समां गयी ,, श्री राम ने भी अपने तईं सजू नदी के हवाले करके अपनी जान देदी ,,
यह थे श्री राम जिन में छद्मनाम धारी जी आप की एसी ही आस्था हे जैसे करोड़ों मुसलमानों की उस ईश्वर , सर्वशक्तिमान अल्लाह में जो यूनिक हे ,जिसे किसी ने न तो जना हे ,और न वः किसी से जना गया हे ,, और उस के जैसा कुछ भी नहीं ,,
अंत में अनवर जमाल के उस सवाल का जवाब भी ज़रूरी हे जिस में उन हों ने कहा हे कि राम , और दशरत के पुत्र राम चन्द्र को गुड मुड़ न करें , मुझे बताइए कि यह अलग से केवल राम कहाँ से आ गया , ? ,, जिस राम की राम लीला मनाई जाती हे जो बाल्मीकि के द्वारा रामायण में वर्णित हे ,, क्या उस के आलावा भी कोई राम हे ? ,,अगर हे तो वः केवल आप कि घडी मढ़ी आस्था से नहीं होगा उस का हवाला दीजिये ,,यह तो ऐसी ही बात हुयी जैसे आज कल कुछ लोग शिर्डी वाले बाबा का मंदिर बना कर उन की मूर्ती को पूज रहे हें, अब अगर उन को कोई यह कहने लगे कि भाई ,,, शिर्डी वाले की मूर्ती को मत पूजो ,इस में कुछ नहीं ,, तो वः कहे कि ,, शिर्डी वाले पीर और उन की मूर्ती को गुड मुड मत करये,, शिर्डी वाले पीर एक व्यक्ति थे और उनकी मूर्ती ईश्वर हे ,, तो छद्मनाम धारी भाई,, इस फलसफे को तो बस आप सझेंऔर या फिर अनवर जमाल समझे ,, हम तो आप के लिए अल्लाह से दुआ करते हें कि वः आप को और हम सब को सीधी और सच्ची राह दिखाए
Wednesday, August 4, 2010
मेरे प्यारे अरविन्द मिश्रा
मेरे प्यारे अरविन्द मिश्रा
आप नास्तिक हें तो श्री राम में आस्था क्यों ? ,, दर असल आप जैसे लोगो की कहानी शुत्रमुर्ग की सी हे जिस से कहाजाए कि तुम पक्षी हो तो उड़ते क्यों नहीं तो वः कहता हे कि मैं पक्षी नहीं ऊँट हूँ ,, और जब उस से कहा जाए की तुम ऊँट हो तो बोझ उठाओ तो वः कहता हे कि मैं तो पक्षी हूँ ..
आइये अब इस पर विचार करे कि अल्लाह को पर्योगशाला में सिद्ध किया जा सकता हे या नहीं ,
मेरे प्यारे यह सारा ब्रह्मांड इश्वर की प्रयोगशाला हे , यह धरती यह आकाश और यह चाँद सितारे चीख चीख कर कह रहे हें कि यह सब स्वयं से नहीं ,, इस बोलते मानव का अपना वजूद खामोश जुबान से गवाही दे रहा हे कि कोई हे जो इस के पैदा होने से पहले माँ कि छाती में दूध उतार देता हे ,,, हजारों महान गेलक्सीज़ और उन के अथाह राज़ मजबूर करते हें कि इन के पीछे कोई सत्ता मानी जाए जो इस बर्हमांड को भली भांति चला रही हे ,,
आज इस शक्ति का वजूद तो हर कस व् न कस स्वीकार करता हे , ख्याल रहे कि अल्लाह/गोड़ कोई मानव जेसी वास्तु नहीं ,जो इंसानी शक्ल में ही आप के सामने आए तो आप मानेंगे वर्ना नहीं ,, वेसे आप मोत को तो मानते ही होंगे ,, और जहाँ इंसान बेबस और लाचार नज़र आए , अर्थात जैसे वः मोत के सामने बेबस हो जाता हे तो फिर उसे मान लेना चाहिए कि कोई हे , जो उस के ऊपर हे ,जो उसके जीवन व् म्रत्यु को कंट्रोल कर रहा हे ,, और अगर अब आप नहीं मानते तो उस समय ,अर्थात म्रत्यु के पश्चात् देख कर मानेंगें जब मानने से कोई लाभ नहीं होगा , कुरान में हे ,,
और लोगों को उस दिन से डराइये जब अज़ाब आएगा , उस समयं ज़ालिम
लोग (इंकार करनेवाले) कहेंगे .हे ईश्वर हमें थोड़ी मोहलत देदे ,अब की बार हम
तेरे पैगाम को स्वीकार करेंगे , और संदेष्ठा के बताए मार्ग पर चलेंगे , ( १४/४४)
आप नास्तिक हें तो श्री राम में आस्था क्यों ? ,, दर असल आप जैसे लोगो की कहानी शुत्रमुर्ग की सी हे जिस से कहाजाए कि तुम पक्षी हो तो उड़ते क्यों नहीं तो वः कहता हे कि मैं पक्षी नहीं ऊँट हूँ ,, और जब उस से कहा जाए की तुम ऊँट हो तो बोझ उठाओ तो वः कहता हे कि मैं तो पक्षी हूँ ..
आइये अब इस पर विचार करे कि अल्लाह को पर्योगशाला में सिद्ध किया जा सकता हे या नहीं ,
मेरे प्यारे यह सारा ब्रह्मांड इश्वर की प्रयोगशाला हे , यह धरती यह आकाश और यह चाँद सितारे चीख चीख कर कह रहे हें कि यह सब स्वयं से नहीं ,, इस बोलते मानव का अपना वजूद खामोश जुबान से गवाही दे रहा हे कि कोई हे जो इस के पैदा होने से पहले माँ कि छाती में दूध उतार देता हे ,,, हजारों महान गेलक्सीज़ और उन के अथाह राज़ मजबूर करते हें कि इन के पीछे कोई सत्ता मानी जाए जो इस बर्हमांड को भली भांति चला रही हे ,,
आज इस शक्ति का वजूद तो हर कस व् न कस स्वीकार करता हे , ख्याल रहे कि अल्लाह/गोड़ कोई मानव जेसी वास्तु नहीं ,जो इंसानी शक्ल में ही आप के सामने आए तो आप मानेंगे वर्ना नहीं ,, वेसे आप मोत को तो मानते ही होंगे ,, और जहाँ इंसान बेबस और लाचार नज़र आए , अर्थात जैसे वः मोत के सामने बेबस हो जाता हे तो फिर उसे मान लेना चाहिए कि कोई हे , जो उस के ऊपर हे ,जो उसके जीवन व् म्रत्यु को कंट्रोल कर रहा हे ,, और अगर अब आप नहीं मानते तो उस समय ,अर्थात म्रत्यु के पश्चात् देख कर मानेंगें जब मानने से कोई लाभ नहीं होगा , कुरान में हे ,,
और लोगों को उस दिन से डराइये जब अज़ाब आएगा , उस समयं ज़ालिम
लोग (इंकार करनेवाले) कहेंगे .हे ईश्वर हमें थोड़ी मोहलत देदे ,अब की बार हम
तेरे पैगाम को स्वीकार करेंगे , और संदेष्ठा के बताए मार्ग पर चलेंगे , ( १४/४४)
Tuesday, August 3, 2010
राम का अस्तित्व और राम जन्मभूमि
डाक्टर अयाज़ ने एक अहम् सवाल उठाया ,इस पर टिपण्णी भी खूब आइ परन्तु जवाब किसी ने नहीं दिया , वजह यह हे कि इसका जवाब हे ,नहीं , और जवाब इस लिए नहीं कि अभी तो यह भी तय नहीं हुआ कि राम पैदा भी हुए हैं या नहीं , यह सवाल डॉ0 अयाज़ के सवाल से भी गंभीर हे ,परन्तु इन सवालों को कोई इस लिए नहीं उठता कि किसी कि भावनाओं को ठेस न पहुंचे ,हम ने इस को उठाने कि हिम्मत तब कि जब स्वयं कुछ हिन्दू विद्वानों ने इस परकार के सवाल उठाने आरम्भ कर दिए ,जैसा कि मालूम होगा कि मुख्य मंत्री करूणानिधि ने कहा था कि राम का अस्तित्व एसा ही झूट हे जैसा हिमालय का सच , समुद्र सेतु के मसले पर स्वयं भारत सरकार ने शपत पत्र के द्वारा कहा था कि राम एक अफ्सान्वी किरदार हे और उस के होने का कोई एतिहासिक परमाण नहीं हे , फिर उस ने वह शपत पत्र जल्दी में वापस भी लेलिया,था . क्यों कि उस पर कट्टरपंथियों ने वाविला मचा दिया था , परन्तु इस से यह तो पता चल ही गया कि राम कितने एतिहासिक हें ,राम को महात्मां गाँधी भी एतिहासिक नहीं मानते थे और उन्हों ने अपने द्वारा निकाले जा रहे अख़बार ,हरिजन में राम को एक अफ्सान्वी किरदार लिखा था ,तफसील और हवाले के लिए आप मेरी किताब ,जिहाद या फसाद , का अध्यन कर सकते हें..
ऐसे मैं सवाल खड़ा होता हे कि जब राम ही नहीं हुए तो जन्म भूमि कैसी ? परन्तु कौन मानता हे और कौन सुनता हे , यहाँ तो जिसका डंडा उस की भेंस हे , लेकिन सच बहरहाल सच हे ,
खून आखिर खून हे टपकेगा तो जम जाएगा
ऐसे मैं सवाल खड़ा होता हे कि जब राम ही नहीं हुए तो जन्म भूमि कैसी ? परन्तु कौन मानता हे और कौन सुनता हे , यहाँ तो जिसका डंडा उस की भेंस हे , लेकिन सच बहरहाल सच हे ,
खून आखिर खून हे टपकेगा तो जम जाएगा
Saturday, July 24, 2010
छुवा छूत का रोग
छुवा छूत का रोग
हालिया दिनों मैं चर्चा का विषय रहा ,यह छुवा छूत का समाचार था, खबर है कि किसी सरकारी स्कूल के बच्चों ने एक दलित महिला के हाथ का बना खाना खाने से इनकार कर दिया ,इस पर कुछ विचारकों ने अपनी अपनी टिपण्णी प्रस्तुत की , हिंदी के जाने माने लेखक डाक्टर महीप सिंह ने २२ जोलाई २०१० को ,,देनिक जागरण,, में एक गंभीर लेएतराज लेख लिखा ,उन्हों ने कई ऐसी जगहों की निशानदही की,जहाँ यह बीमारी खूब फल फूल रही हे ,और इसे रोक ने वाला कोई नहीं ,
१७ जनवरी २००९ को ,, दैनिक जागरण ,,में एक समाचार में बताया गया था कि, भूनेश्वर में परदेश की एक दलित मंत्री मंदिर से पूजा करके निकली तो ,मंदिर का शुद्धिकरण किया गया ,
इस परकार के समाचार कोई नयी बात नहीं ,यह हम आए दिन देखते और सुनते रहते हें ,और इनके विरुद्ध विद्द्वानगाणों के विचार भी पढ़ने को मिलते रहते हें ,परन्तु क्या आपने सोचा हे कि, इक्कीसवी सदी के इस आधुनिक युग में भी यह वबा हमारा पीछा क्यों नहीं छोढ़ रही हे ,तो आइये मैं आप को बताता हूँ ,,,बात असल यह हे कि यह मुद्दा उन तत्त्वों के लिए विचारणीय हे ,जो सीना तान कर कहते हें ,,, गर्व से कहो हम हिन्दू हें ,, हिन्दू होने का मतलब क्या हे , यही न कि आप उस कि विचारधारा को मानेंगे ,, और उस की विचारधारा की बुनीयाद है वर्ण व्यवस्था और यह व्यवस्था टिकी हुयी ही छुवाछूत पर हे ,,आप हिन्दू धर्म की कोई भी धर्म पुस्तक उठालें ,इतनी सफाई के साथ उस में छुवाछूत आप को मिलेगी की जिस का इंकार संभव नहीं ,मसलन ,,मनुस्मार्ती,, को लें,, उस का आरम्भ ही चार वर्णों की बात से होता हे ,फिर दूसरे अद्ध्याय के १७५ वें श्लोक में शूद्र के लिए वेद पाठ वर्जित किया गया हे ,चोथे अद्ध्याय के १८० वें श्लोक में ब्रह्मन को कहा गया हे की वः शूद्र को कोई परामर्श भी न दे ,यहाँ तक कि उसे हवन के बाद का परसाद तक देने कि मनाही हे ,पांचवे अद्ध्याय के ९५ वें श्लोक में उसकी अर्थी उस रस्ते से भी लेजाने की अनुमति नहीं हे जिस से ब्रह्मन की जाती हे ,
इस पारकर के दर्जन भर श्लोक आप को इस ,,स्मर्ति,, में मिलेंगे , जो दलित को नीच साबित कर रहे होंगे ,,
केवल म्नुस्मारती ही की बात नहीं , महाभारत, हो या ,,रामायण,,छुवाछूत और ऊँच नीच की बात सब में हे ,रामायण के नायक श्री राम ने तो शम्बूक नामी दलित का वध ही इस कारन से कर दिया था कि उस ने दलित हो कर भी जपतप करने का साहस किया था ,और राम चरित्र मानस के रचयता ने तो यहाँ तक लिख दिया कि ,,, ढोल गंवार शूद्र और नारी
यह सब हें ताडन के अधिकारी
ऐसे में प्रश्न यह हे कि आखिर छुवाछूत का यह रोग कैसे ख़त्म हो सकता हे ,,
मैं जानता हूँ कि आज कल कुछ लोग धर्म के इन आदेशों ,उपदेशों को तोड़मरोड़ कर कुछ का कुछ अर्थ बताने का पर्यास करते हें , परन्तु कोन नहीं जानता कि सच्चाई क्या हे ,,इस सच्चाई को साबित करने के लिए केवल वर्तमान की स्थिति ही पर्याप्त हे ,,,
हालिया दिनों मैं चर्चा का विषय रहा ,यह छुवा छूत का समाचार था, खबर है कि किसी सरकारी स्कूल के बच्चों ने एक दलित महिला के हाथ का बना खाना खाने से इनकार कर दिया ,इस पर कुछ विचारकों ने अपनी अपनी टिपण्णी प्रस्तुत की , हिंदी के जाने माने लेखक डाक्टर महीप सिंह ने २२ जोलाई २०१० को ,,देनिक जागरण,, में एक गंभीर लेएतराज लेख लिखा ,उन्हों ने कई ऐसी जगहों की निशानदही की,जहाँ यह बीमारी खूब फल फूल रही हे ,और इसे रोक ने वाला कोई नहीं ,
१७ जनवरी २००९ को ,, दैनिक जागरण ,,में एक समाचार में बताया गया था कि, भूनेश्वर में परदेश की एक दलित मंत्री मंदिर से पूजा करके निकली तो ,मंदिर का शुद्धिकरण किया गया ,
इस परकार के समाचार कोई नयी बात नहीं ,यह हम आए दिन देखते और सुनते रहते हें ,और इनके विरुद्ध विद्द्वानगाणों के विचार भी पढ़ने को मिलते रहते हें ,परन्तु क्या आपने सोचा हे कि, इक्कीसवी सदी के इस आधुनिक युग में भी यह वबा हमारा पीछा क्यों नहीं छोढ़ रही हे ,तो आइये मैं आप को बताता हूँ ,,,बात असल यह हे कि यह मुद्दा उन तत्त्वों के लिए विचारणीय हे ,जो सीना तान कर कहते हें ,,, गर्व से कहो हम हिन्दू हें ,, हिन्दू होने का मतलब क्या हे , यही न कि आप उस कि विचारधारा को मानेंगे ,, और उस की विचारधारा की बुनीयाद है वर्ण व्यवस्था और यह व्यवस्था टिकी हुयी ही छुवाछूत पर हे ,,आप हिन्दू धर्म की कोई भी धर्म पुस्तक उठालें ,इतनी सफाई के साथ उस में छुवाछूत आप को मिलेगी की जिस का इंकार संभव नहीं ,मसलन ,,मनुस्मार्ती,, को लें,, उस का आरम्भ ही चार वर्णों की बात से होता हे ,फिर दूसरे अद्ध्याय के १७५ वें श्लोक में शूद्र के लिए वेद पाठ वर्जित किया गया हे ,चोथे अद्ध्याय के १८० वें श्लोक में ब्रह्मन को कहा गया हे की वः शूद्र को कोई परामर्श भी न दे ,यहाँ तक कि उसे हवन के बाद का परसाद तक देने कि मनाही हे ,पांचवे अद्ध्याय के ९५ वें श्लोक में उसकी अर्थी उस रस्ते से भी लेजाने की अनुमति नहीं हे जिस से ब्रह्मन की जाती हे ,
इस पारकर के दर्जन भर श्लोक आप को इस ,,स्मर्ति,, में मिलेंगे , जो दलित को नीच साबित कर रहे होंगे ,,
केवल म्नुस्मारती ही की बात नहीं , महाभारत, हो या ,,रामायण,,छुवाछूत और ऊँच नीच की बात सब में हे ,रामायण के नायक श्री राम ने तो शम्बूक नामी दलित का वध ही इस कारन से कर दिया था कि उस ने दलित हो कर भी जपतप करने का साहस किया था ,और राम चरित्र मानस के रचयता ने तो यहाँ तक लिख दिया कि ,,, ढोल गंवार शूद्र और नारी
यह सब हें ताडन के अधिकारी
ऐसे में प्रश्न यह हे कि आखिर छुवाछूत का यह रोग कैसे ख़त्म हो सकता हे ,,
मैं जानता हूँ कि आज कल कुछ लोग धर्म के इन आदेशों ,उपदेशों को तोड़मरोड़ कर कुछ का कुछ अर्थ बताने का पर्यास करते हें , परन्तु कोन नहीं जानता कि सच्चाई क्या हे ,,इस सच्चाई को साबित करने के लिए केवल वर्तमान की स्थिति ही पर्याप्त हे ,,,
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