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Wednesday, September 14, 2016

बकरीद,या "कुरबानी" पर एतराज क्यों? !......... एक मित्र ने सोशल मीडिया के माध्यम से कुरबानी पर एतराज करते हुए आमिर खान को संबोधित व्यंग भरा मेसेज भेजा है, वह लिखते है " डियर आमिर तुम कहां हो," पी के फिल्म में हिन्दू देवी देवताओं की मजाक उडाने वाले को कुरबानी मे जानवरों पर अत्याचार क्यों नजर नहीं आता,? बकरईद के मोके पर मीडिया के माध्यम से यह सूचना भी मिली थी कि सुप्रीम कोर्ट के सात जजों ने न्यायालय में रिट डाल कर कुरबानी पर प्रतिबंद लगाने की प्रार्थना की है,इस के अलावा भी समय समय पर देश मे बहुसंख्यकों का एक विशेष वर्ग कुरबानी को ले कर मुसलमानो को निर्दयी,अत्याचारी,और करूर साबित करता रहा है,और मुसलमानों को निशाना बनाते हुए वह कुरबानी पर पर्तिबन्ध लगाने की मांग कर ता आ रहा है,उच्चतम न्यायालय के जिन अधिवक्ताओं ने जानवरों पर अत्याचार की दुहाई देते हुए कुरबानी के दिन पशू हत्या पर रोक लगाने की मांग की है क्या वह बकताएंगे कि 365 दिन में एक विशेष दिन (बकरीद का दिन)में उन की मांग को स्वीकार करते हुए अगर पशुहत्या पर प्रतिबन्ध लगा ही दिया जाए तो क्या एक दिन के प्रतीबन्द से देश या दुनिया से पशुहत्या का खात्मा होजाएगा, भारत में एक अन्दाजे के अनुसार प्रतिदिन दो लाख से अधिक( मुर्गा और मछली को छोड कर) पशुऔं की हत्या मीट खाने के लिए की जाती है,इस में मुसलमानों का हिस्सा बीस प्रतीशत से अधिक नही है, यकीन न आए तो आप अपने शहर या क्षेत्र में मीट की दुकानों एंव नॉन वेज होटलों का जायजा लें और देखें कि इस प्रकार की दुकानें या होटल्स मुसलमानों के अधिक हैं या गैर मुस्लिमों के, यह भी खयाल रहे कि मुसलमान झटके का मीट नही खाता इस लिए वह गैर मुसलिम होटल या मीट शॉप्स पर मीट खाने या खरीदने नही जाता जब कि मुस्लिम मीट शॉप और होटलो पर गैर मुस्लिम बडी संख्या में मीट खाने और खरीदने आता है ,मुर्गा ,बकरा,और मछली की मुस्लिम दुकानों के तो सत्तर प्रतीशत ग्राहक ही गैर मुस्लिम होते हैं,प्रश्न यह है कि पशुओं पर अत्याचार को रोकने के लिए एक बकरीद के दिन पशु हत्या पर प्रतीबन्द क्या मसले का हल है, अगर बकरीद के दिन की कुरबानी ही इस की जिम्मेदार है तो क्या मुल्क भर में मोजूद गैर मुस्लिमों की मीट शापों पर बकरीद के दिन भी पशु हत्या नही होती, सुअर पालन देश मे,एक बडा उद्योग हे उस की पेैदावार ही मीट प्राप्ती के लिए की जाती है,इस के अलावा वह कोई हल में नही चलता,एक मुसलमान उस को छू भी नही सकता वह केवल गैर मुस्लिमों की ही खूराक बनता है,उस की हत्या पर प्रतिबन्ध की बात कोई क्यों नही करता? जब कि उस की तो हत्या भी बहुत ही निर्मम तोर पर की जाती है,उस की गर्दन पर छुरी काम नही करती अत:उस की गर्दन के नीचे दोनों बाजुओं के बीच से उस के ह्रदय में छुरा घोंप कर उस की हत्या की जाती है, इसी के साथ वह हिन्दु मिथ्यालोजी मे विषणु का पर्थम अवतार भी है, फिर भी उस का ख्याल न तो किसी हिन्दु संस्था को आया और न किसी उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता को,जिसका अर्थ यह है कि कुरबानी पर प्रतिबन्ध की मांग का आधार पशु प्यार नही है अपितु निशाने पर मुसलमान हैं,जिन्हें मुसलमानों से ही खुदा वासते का बैर है वह किसी न किसी बहाने से विरोध की जवाला जलाए रखना चाहते हैं, पशुप्यार में कुरबानी पर प्रतिबन्ध की मांग करने वालों को क्या यह पता नहीं है कि मानव जगत की 98% आबादी मासाहारी है,और मांस व उस के अवशेषों से जुडी वस्तुओं का कारोबार भारत का एक शीर्ष उद्योग है जो 95% हिन्दुओं के हाथ में है,भारत के 21 बडे मीट पलान्टों में से 20 हिन्दुओं के हैं इस देश की सब से बडी मीट एक्सपोर्ट कम्पनी " अलकबीर" के चार शियर होल्डरों में सब के सब हिन्दू हैं, भारत में प्रती दिन दस लाख से अधिक मुर्गे काटे जाते हैं, मुर्गा पालन एक मेजर उद्योग है,उत्तरी भारत मे पंजाब उसकी बडी मंडी है जहां से यूपी, उत्राखण्ड, हरयाणा, दिल्ली, और हिमाचल तक मुर्गा सपलाई होता है ,यहां पर यह उद्योग पूर्णत: गैर मुस्लिमों के हाथ में है,अगर पशुमित्रों की बात मानते हुए पशुहत्या पर पर्तिबनध लगा दिया जाए तो कितने लोग बेरोजगार होंगे और देश के राज कोष मे आने वाले रिवेनयु पर जो असर पडेगा पशुमित्रों को उस का अनदाजा नही है, बात दर असल यह है कि हिन्दुवादी गिरोह कुरबानी की तुलना अपने यहां की जाने वाली " बली" से करता है जिसे वह छोडता जा रहा है, जब कि कुरबानी उस से एक दम इतर है, देवी देवताओं के चरनों में किसी पशू को काट कर केवल खूं बहाने से उस का कोई संबन्ध है और न ही वह पत्थर की मूर्ती पर व्यर्थ दूध बहाने जैसा है, स्वंय कुरआन में कहा गया है कि, न तो अल्लाह को खून पहुचता और न गोश्त,हां उसे तकवा पहुचता है, (सूरह हज आयत 37) तकवा क्या है? जिसके तहत कुरबानी की जाती है जो एक अत्यन्त उपयोगी एंव लाभकारी कृत्य है,वह कैसे? इस का वर्णन हम अपने अगले लेख मे करेगें साथ ही यह भी बताएगें कि पशु हत्या एक सवभाविक क्रिया है उस मे न तो किसी जीव को पीडा दी जाती और किसी पर जुल्म किया जाता, यह सब कैसे? यह जान ने के लिए इन्तिजारकी जिए हमारी अगली पोस्ट का ..................................

 एतराज क्यों? !.........

      एक मित्र ने सोशल मीडिया के माध्यम से कुरबानी पर एतराज करते हुए आमिर खान को संबोधित व्यंग भरा मेसेज भेजा है, वह लिखते है " डियर आमिर तुम कहां हो," पी के फिल्म में हिन्दू देवी देवताओं की मजाक उडाने वाले को कुरबानी मे जानवरों पर अत्याचार क्यों नजर नहीं आता,? बकरईद के मोके पर मीडिया के माध्यम से यह सूचना भी मिली थी कि सुप्रीम कोर्ट के सात जजों ने न्यायालय में रिट डाल कर कुरबानी पर प्रतिबंद लगाने की प्रार्थना की है,इस के अलावा भी समय समय पर देश मे बहुसंख्यकों का एक विशेष वर्ग कुरबानी को ले कर मुसलमानो को निर्दयी,अत्याचारी,और करूर साबित करता रहा है,और मुसलमानों को निशाना बनाते हुए वह कुरबानी पर पर्तिबन्ध लगाने की मांग कर ता आ रहा है,उच्चतम न्यायालय के जिन अधिवक्ताओं ने जानवरों पर अत्याचार की दुहाई देते हुए कुरबानी के दिन पशू हत्या पर रोक लगाने की मांग की है क्या वह बकताएंगे कि 365 दिन में एक विशेष  दिन (बकरीद का दिन)में उन की मांग को स्वीकार करते हुए अगर पशुहत्या पर प्रतिबन्ध लगा ही दिया जाए तो क्या एक दिन के प्रतीबन्द से देश या दुनिया से पशुहत्या का खात्मा होजाएगा, भारत में एक अन्दाजे के अनुसार प्रतिदिन दो लाख से अधिक( मुर्गा और मछली को छोड कर) पशुऔं की हत्या मीट खाने के लिए की जाती है,इस में मुसलमानों का हिस्सा बीस प्रतीशत से अधिक नही है, यकीन न आए तो आप अपने शहर या क्षेत्र में मीट की दुकानों एंव नॉन वेज होटलों का जायजा लें और देखें कि इस प्रकार की दुकानें या होटल्स मुसलमानों के अधिक हैं या गैर मुस्लिमों के, यह भी खयाल रहे कि मुसलमान झटके का मीट नही खाता इस लिए वह गैर मुसलिम होटल या मीट शॉप्स पर मीट खाने या खरीदने नही जाता जब कि मुस्लिम मीट शॉप और होटलो पर गैर मुस्लिम बडी संख्या में मीट खाने और खरीदने आता है ,मुर्गा ,बकरा,और मछली की मुस्लिम दुकानों के तो सत्तर प्रतीशत ग्राहक ही गैर मुस्लिम होते हैं,प्रश्न यह है कि पशुओं पर अत्याचार को रोकने के लिए एक बकरीद के दिन पशु हत्या पर प्रतीबन्द क्या मसले का हल है,  अगर बकरीद के दिन की कुरबानी ही इस की जिम्मेदार है तो क्या मुल्क भर में मोजूद गैर मुस्लिमों की मीट शापों पर बकरीद के दिन भी पशु हत्या नही होती,         सुअर पालन देश मे,एक बडा उद्योग हे उस की पेैदावार ही मीट प्राप्ती के लिए की जाती है,इस के अलावा वह कोई हल में नही चलता,एक मुसलमान उस को छू भी नही सकता वह केवल गैर मुस्लिमों की ही खूराक बनता है,उस की हत्या पर प्रतिबन्ध की बात कोई क्यों नही करता? जब कि उस की तो हत्या भी बहुत ही निर्मम तोर पर की जाती है,उस की गर्दन पर छुरी काम नही करती अत:उस की गर्दन के नीचे दोनों बाजुओं के बीच से उस के ह्रदय में छुरा घोंप कर उस की हत्या की जाती है, इसी के साथ वह हिन्दु मिथ्यालोजी मे विषणु का पर्थम अवतार भी है, फिर भी उस का ख्याल न तो किसी हिन्दु संस्था को आया और न किसी उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता को,जिसका अर्थ यह है कि कुरबानी पर प्रतिबन्ध की मांग का आधार पशु प्यार नही है अपितु निशाने पर मुसलमान हैं,जिन्हें मुसलमानों से ही खुदा वासते का बैर है वह किसी न किसी बहाने से विरोध की जवाला जलाए रखना  चाहते हैं, पशुप्यार में कुरबानी पर प्रतिबन्ध की मांग करने वालों को क्या यह पता नहीं है कि मानव जगत की 98% आबादी मासाहारी है,और मांस व उस के अवशेषों से जुडी वस्तुओं का कारोबार भारत का एक शीर्ष उद्योग है जो 95% हिन्दुओं के हाथ में है,भारत के 21 बडे मीट पलान्टों में से 20 हिन्दुओं के हैं इस देश की सब से बडी मीट एक्सपोर्ट कम्पनी " अलकबीर" के चार शियर होल्डरों में सब के सब हिन्दू हैं,
     भारत में प्रती दिन दस लाख से अधिक मुर्गे काटे जाते हैं, मुर्गा पालन एक मेजर उद्योग है,उत्तरी भारत मे पंजाब उसकी बडी मंडी है जहां से यूपी, उत्राखण्ड, हरयाणा, दिल्ली, और हिमाचल तक मुर्गा सपलाई होता है ,यहां पर यह उद्योग पूर्णत: गैर मुस्लिमों के हाथ में है,अगर पशुमित्रों की बात मानते हुए पशुहत्या पर पर्तिबनध लगा दिया जाए तो कितने लोग बेरोजगार होंगे और देश के राज कोष मे आने वाले रिवेनयु पर जो असर पडेगा पशुमित्रों को उस का अनदाजा नही है,
       बात दर असल यह है कि हिन्दुवादी गिरोह कुरबानी की तुलना अपने यहां की जाने वाली " बली" से करता है जिसे वह छोडता जा रहा है, जब कि कुरबानी उस से एक दम इतर है, देवी देवताओं के चरनों में किसी पशू को काट कर केवल खूं बहाने से उस का कोई संबन्ध है और न ही वह पत्थर की मूर्ती पर व्यर्थ दूध बहाने जैसा है, स्वंय कुरआन में कहा गया है कि, न तो अल्लाह को खून पहुचता और न गोश्त,हां उसे तकवा पहुचता है, (सूरह हज आयत 37) तकवा क्या है? जिसके तहत कुरबानी की जाती है जो  एक अत्यन्त उपयोगी एंव लाभकारी कृत्य है,वह कैसे?  इस का वर्णन हम अपने अगले लेख मे करेगें साथ ही यह भी बताएगें कि पशु हत्या एक सवभाविक क्रिया है उस मे न तो किसी जीव को पीडा दी जाती और न किसी पर जुल्म किया जाता, यह सब कैसे?  यह जान ने के लिए इन्तिजारकी जिए हमारी अगली पोस्ट का ..................................

Sunday, December 6, 2015

कभी निषपक्ष होकर विचार की जिये

कभी निषपक्ष होकर ठंडे दिमाग से विचार की जिये,,,,,, धर्म पूर्णत: देवीय होता है जिस का मूल भूत आधार मरनोपरांन्त कर्मफल भोग है,उस के नियम अटूट ईशवरीय अनादी से अनंत तक के लिये होते हैं,वह मानव द्वारा अपनी अपनी सहूलत स्वार्थ के अनुसार बदले नही जाते कि सो पचास साल पहले नियोग एक उपयोगी व्यवस्था थी परन्तु अब समाज उसे पसंद नही करता तो अब वह बुरी हो गई, कल तक वर्ण व्यवस्था से मनुवादियों का काम निकलता था तो वह बहुत उपयोगी थी परन्तु अब समय उस की अनुमती नही देता तो उसे छोडना... मजबूरी है,कल तक महिला पैर की जूती थी इस लिये वह अगर विधवा होजाये तो उस के लिये उचित विकल्प केवल पती की चीता के साथ जल कर मर जाना था परन्तु आज दुनिया भर में महिला अधिकार की संसथाएं गांड में डंडा कर देंगीं तो हम ने सती की बात छोड महिला अधिकार की बात शुरू करदी ,, आदि, आदि, ,,,, कभी इस पर भी विचार की जियेगा कि हम जिसे धर्म समझ कर उसे दिल से चिमटाए हुए हैं कही मनुवादी धर्म माफियाऔं द्वारा जन्ता का शोशण करने का हथियार तो नही था , क्या आप को नही लगता कि, लिंग, योणी,कृष्ण की कामवासना युक्क रास लीलाएं,धर्म के बडे बडे पर्वरतकों द्वारा कुंवारियों से वयभिचार, देवताऔं का अपसराऔं को देखना और कामवासना मे उत्तेजित हो कर स्खलित होजाना ,अपना वीरय कहीं घडे मे कही सरकंडे में कहीं पानी मे छोडना,इन बातों का धर्म पुस्तकों मे होना धर्म माफियाऔं द्वारा अपनी काम त्रापती की प्राप्ती का हथियार तो नही था, और उन्हों ने ही यह डोज दे कर कि अपना गुण रहित धर्म भी उत्तम है,कही हमें बली का बकरा तो नही बनाना चाहा है ,जरा निष्पक्ष हो कर कभी सोचियेगा तो, कि, एक वयक्ति कहता है अपना गलत सी सही क्यों कि वह अपना है और दूसरे का सही भी गलत, जब कि, दूसरा व्यक्ति कहता है, अपना वही है,कि जो सही है,चाहे वह कही भी किसी के पास भी हो, ,,,,इन में से किस की बात सही है, ,,इस पर विचार कीजिये,,,, See More

Saturday, June 27, 2015

गूलर का पेट न फड़वाओ। ,

  वाट्सअप पर एक ऊट पटांग  मेसेज पराप्त हुआ ,मेसेज में मुसलमानों को रावण की बहिन शूर्पनखा  के वंशज कहा गया है ,यानी अंधे को अँधेरे में बहुत दूर की सूजी ,लिखा है कि शूर्पनखा नाक कान  कट जाने के कारण अपने चेहरे को ढांपे रहती थी इस लिए मुस्लिम औरते भी अपने चेहरे को ढांपे रहती हैं कैसी तथ्यहीन बात है ,मुस्लिम औरतें तो इस लिए पर्दा करती हैं क्यों कि पवित्र क़ुरआन में महिलाओं को आदेश है कि वे अपने शरीर के उन अंगों को छुपा कर रखें जिन्हें देख कर नौजवान मर्दों के दिलों में हैजान पैदा न हो ताकि ऐसी घटनाएँ न हो पाएं जैसी आज कल उन समाजों में देखने को मिल रही हैं जो पर्दे का विरोध करते हैं और नतीजे के तोर पर जवान लड़कियों को बलात्कारियों के रहम व करम पर छोड़ देते हैं जो महिलाएं पर्दा करती हैं नतीजा उन के सामने है की वह अपनी इज़्ज़त व आबरू को सुरक्षित रखने में कामयाब रहती हैं
      ,खैर बात हो रही थी एक ऊट पटांग मेसेज की ,तो आगे महान लेखक लिखते हैं की   शुक्राचार्य को शिव ने अपना लिंग  दिया जो उन्हों ने दूर रेगिस्तान में मक्का मदीना में  गाड़ा  ,इन्हे शर्म नहीं आती लिंग ,लिंग ,लिंग ,क्या बेहयाई की बातें हैं ,लिंग वह भी उस का जिस की पूजा करते हैं खुद बेशर्म हैं दूसरों को बेशर्म देखना चाहते हैं और ज्ञान इतना है कि यह भी नहीं मालूम कि मक्का और मदीना दो अलग अलग शहर है जिन में पांच सो किलो मीटर के क़रीब का फासला  है ,भला मक्का व् मदीना जैसी पाक जगह में जहाँ सतर अर्थात नाफ  से गुटनों तक शरीर का इंच भर हिस्सा भी खोला नहीं जासकता उस स्थान के संबंध लिंग लिंग लिंग जैसी बकवास ? क्या मायने  रखती है, यह तो तुम्हारे यहाँ है कि जितना नंगा उतना बड़ा महात्मा और लिंग जो नग्न्ता  का प्रतीक है उसकी तो पूजा होती है वह भी उस स्थिति में कि वह पार्वती की योनि में गड़ा हुआ है, अरे कमबख़्तो सभ्य समाज में यह काम बहुत छुप कर रात  के अँधेरे में होता है और तुम हो कि माँ बहिन और बाप,एक साथ  इस नग्न और गंदी अवस्था को पूजते हो ,और इसी गंदगी को पूजना है तो शोक से पूजो पर दूसरों को इस गंदगी में क्यों घसीटना चाहते हो, और भला कहाँ शुक्राचाय और कहाँ जुमे का दिन ,लिखा है कि मुस्लमान शुक्राचाय के वंशज हैं इस लिए जुमे के दिन को मानते हैं ,कैसी तथ्यहीन बात है ,और गज़ब यह  कि चोरी ऊपर से सीना जोरी ,लिखा है कि हर बात तथ्य पर आधारित है और तथ्य कोई दिया नहीं ,तो क्या ,तथ्यों पर आधारित है ,कहदेने भर से बात तथ्य पर आधारित हो जाती है ?, अरे जनाब तुम ने जिस रामायण से बात शुरू की है क्या वह तथ्यों पर आधारित है? क्या उस का समय काल बता सकते हो ,?सीता ज़मीन से निकली थी क्या तुम्हारे पास इसका तथ्य है? रावण हिरन बन कर चर ने लगा था क्या इसका तथ्य है रावण सीता को हवाई मार्ग से ले गया था क्या इसका तथ्य है ,? करते है बात तथ्यों की ?राजा दशरत ने तीन शदया कीं ,लेकिन किसी पत्नी से भी बच्चा पैदा न कर सके तो पुत्रोत्पत्ति यग किया जिसमे श्रंगी ऋषि को बुलाया गया जिस ने एक ही रात में तीनों रानियों को गर्भवती बना दिया ,इस के बारे में क्या ख्याल है गोया ऋषि न हुआ कोई सांड हुआ ?और जिस शिव लिंग  की बात करते हो शिव पुराण पढ़ कर तो देखो, शिव तो हर समय लिंग पकडे योनि ही के चक्कर में पड़ा रहता था, शिव पुराण के अनुसार उस ने  अपनी लड़की तक न छोड़ी ,
       कहते हो कि ,शूर्पणखा ,शुक्राचाय और रावण आसुर हैं और हम मुस्लमान उन के वंशज हैं,तुम्हें शर्म आनी चाहिए आसुर तुम्हारे देवताओं से अच्छे थे ,देखते नहीं , रावण की  बहिन ने प्यार प्रकट किया तो राम जी ने प्यार का बदला  उसके नाक कान कटवाकर दिया और जब उसका भाई रावण गुस्से में राम की सीता को उठा कर ले गया तो उस ने नैतिकता का परिचय देते हुए सीता को छुआ तक नहीं ,तो पूजा के लायक कोन होआ राम या रावण ?अरे अकल के अंधों कुछ तो बुद्धि से काम लो,और अगर तुम्हे इसी जहालत में पड़े रहना है तो पड़े रहो हम भमे मानसों को क्यों छेड़ ते हो ,?बेहतर हो कि तुम अपने काम से काम रखो और हमें छेड़ कर हम से गूलर का पेट न फड़वाओ।  ,

Friday, April 24, 2015


बस करो महा महिम

        यूपी के महामहिम राम नायक को राम की याद आइ है. उन्हो ने फरमाया है. कि इस देश का राजा कैसा हो ...श्री राम के जैसा हो....श्री नायक देश में ऐसा राजा देखना चाहते हैं जिस के राज मैं किसी शूद्र को ग्यान पराप्त करने या जप तप करने की भी अनुमति न हो जैसा रामायण मे वर्णित कथा के अनुसार श्री राम ने शंबूक नामी शूद्र का वध केवल इस लिये कर दिया था कि उसने शूद्र (नीच कुल मे उत्पन्न होने के बावजूद) जप तप करने और ग्यान पराप्त करने का साहस किया था ...हा. नायक जी चाहते हैं कि इस देश का राजा ऐसा हो कि उसके राज्य में अपनी बेगुनाही साबित करने के लिये मुल्जिम को नन्गे पैरों आग के दहकते अन्गारों पर चलना पडे. फिर भी यह राजा के ऊपर है कि वह मुल्जिम को बे गुनाह माने या न माने. और मुल्जिम को चाहे वह गृभवति महिला ही क्यों न हो शहर बदर कर दे ..जेसा श्री राम ने सीता के साथ किया था. हां ऐसा राज्य जिस मे अगर कोई महिला अगर किसी पुरुष को पसन्द करते हुए उस से शादी का परस्ताव रखे तो उसे पूरा इख्तीयार हो कि वह उस के नाक और कान कटवा डाले. हा ऐसा राज्य जिस में वचन की पूर्ती के लिये पुत्र को घर ले निकाला जा सके ...क्या कोइ बता सकता है कि आज के दोर मैं 'अगर मैने अपनी मां या बहिन या किसी और रिशते दार को कोई वचन दिया था और वह उसके अन्तरगत मैरे पुत्र को घर से निकलवाना चाहती है. और मेरे ऐसा करने पर मेरा पुत्र पुलिस या न्यायालय की शरण मे चला जाता है तो मेरे साथ क्या सलूक किया जाएगा .तो क्या नायक जी चाहते हैं कि ऐसा राज्य आ जाऐ जब राजा ऐसा हो जो पृस्थितियों का मुकाबला न कर ते हुऐ पृस्थिति और परेशानी आने पर अपनी पर्जा को बे यार व मददगार छोड कर खुद नहर मैं डूब मरे.क्या नायक जी इश देश मे उलटी नगरी चोपट राज चाहते है कि दीवार गिरने से पडोसी की बकरी मर गई ....और सूली पर चढा दिया एक गरीब महातमा को. शम्बूक को ऐसे ही तो मारा गया था. रामायण में आई कथा के अनुसार अल्पायु मे एक बृहमण पुत्र की मृत्यू हो गई .पंडितों ने बताया कि इस का कारण यह है कि राम राज्य मै एक अपराध हो रहा है और वह यह कि एक नीच कुल का शूद्र कहीं बैठा जप तप कर रहा है अत:राम ने स्वय जा कर उस का वध कर दिया. यह है वह राम जिन के जैसा इस देश में गवर्नर साहब राजा देखना चाहते हैं. यह आखिर कैसे लोग है इतने बडे पद पर बैठ कर भी बुद्धि से काम नही लेते.क्या इनहोने रामायण नहीं पढी''.ईशवर हमारे इन लीडरों को सद्बुद्धि दे. हम दुआ के सिवा और कर भी क्या सकते हैं.....खिरद का नाम जुनूं रख दिया. जुनूं का खिरद..

Wednesday, March 25, 2015

महेंदर पाल आर्य

दूसरों के कन्धों पर बैठ  कर खुद को बड़ा दिखाने वालों की कमी नहीं है ऐसे ही  साहब हैं महेंदर पाल आर्य ,वह बताते हैं की जनाब किसी मस्जिद में इमामत करते थे ,बेचारे ग़रीब इमाम की औक़ात भी क्या  होती  जिसका  बस  घरवाली पर नहीं चलता वह इमाम पर गुस्सा उतार लेता है ,इन गरीबों को खाना भी अलगअलग  घरों से  मिलता है वह भी मिला मिला, न मिला ,महेंद्र  ने सोचा  क्यों न कारोबार बदला जाए ,तो जनाब महेन्द्रपाल आर्य होगये ,खुद   ही बताते है की पहले उनका नाम महबूब अली था ,चलो पहुंची वहीँ पे ख़ाक जहाँ का खमीर था ,बेहतर हुआ कि जनाब ने जल्द ही  मस्जिद  छोड़ दी वरना जैसी अक़्ल रखते थे न  जाने कितनो का इमान खराब करते ,वह जो कक्षा १ मे बच्चों को पढ़ाया जाता है न, क, से कबूतर ,जब बच्चा अगली कक्षाओं  में जाता है तो उससे उम्मीद  की जाती है कि  वह इस बात को खुद समझ जाये कि  ,क ,से कबूतर का क्या मतलब है और वह यह ज़िद न करने लगजाये कि, क ,से कबूतर ही होता है क से क़लम या क्लास या कुछ और नहीं बन सकता ,बस यही हाल  है जनाब का ,कहते है कि अल्लाह ने कहा  है कि , छ दिनों में उसने सृष्टि को रचा है तो यह बताओ कि सूरज नहीं  था तो दिन का   पता  कैसे चला ,अरे वाह पंडित जी ज्ञानी हो तो ऐसा हो,अरे मेरे भोले पंडित अल्लाह ताला काल और आकाश से परे है उसे इंसानी दिनों से क्या सरोकार ? यहां तुम्हारे जैसे भोले मानव को यह समझाया गया है कि उसने सृष्टि को छ पिरयड में बनाया है जब कि  वह चाहता तो एक शब्द कुन से सृष्टि को बना सकता था ,पंडित जी तुम्हारी यही अदाएं तो यह सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे कहदूं तुम मोलवी थे तुम ने अल्लाह को अर्श पर बिठा कर यह प्रश्न दाग दिया कि  अल्लाह बड़ा  है या अर्श ,अरे महाशय  कहा न कि  वह काल  व् आकाश से परे है उसे बैठने उठने से कोई सरोकार नहीं है,उठना बैठना ,सोना जागना यह सब इंसानी सिफ़ात  हैं ईश्वर तो इन सब से परे  है,  

Sunday, March 22, 2015

महेंद्र पाल आर्य .......,,,,,.... हंसी आती है हजरत ए इनसान पर

महेंद्र पाल आर्य .......,,,,,....  
 हंसी आती है हजरत ए  इनसान  पर 
यूं ट्यूब पर एक वीडयो देखा इस में महेन्दर जी एक किताब का विमोचन कर रहे हैं ,वह कह रहे हैं की उन्हों ने यह किकाब उन के ताल्लुक़ से मेरी किताब के जवाब में है ,मैं ने उन की यह किताब नहीं देखी ,लेकिन उनके भाषण में जो बेतुकी बातें उन के द्वारा कही गई है ,उन्हें सुन कर फिर मुझे वही बात याद आगई जो मैं ने उन पर टिप्पणी कर ते होए कहा था की वह दर्जा दो के बच्चे जैसी बातें करते हैं ,आप भी उनकी बातें सुनये  और उनके दिमाग पर अपना सर धुन ये ,,,,,यह साहब पवित्र क़ुरआन की एक आयत का अर्थ जो इनका अपना घड़ा हुआ है  यों  करते हैं कि ,,,और फिर अल्लाह अर्श पर बैठ  गया ,फिर प्रशन  खड़ा करते हैं ,उनका प्रशन  है कि  ,अल्लाह बड़ा है या अर्श ?फिर कहते हैं कि ,अर्श बड़ा है तो तुम अल्लाहु अकबर अर्थात अल्लाह सब से बड़ा है क्यों कहते हो ?और अगर अल्लाह बड़ा हे तो वह छोटे अर्श पर कैसे आगया ,उनके इस प्र्शन  पर मुझे एक गंवार कहावत याद आरही है ,आप ने भी सुना होगा कि ,अक़्ल बड़ी या भेंस ,बस ऐसा ही इस दर्जो दो के बचे का भी यह प्र्शन है ,उसने अपने भाषण में एक प्र्शन और किया है ,वह क़ुरान की एक आयत पढता है जिम में अल्लाह कहता है की कि हमने सृष्टि को छः दिन में बनाया ,उस पर इन महाशय का प्रशन है कि दिन की पहचान सूर्य से होती है तो यह बताओ कि  सूर्य अगर पहले बनाया तो उसे रखा कहाँ और अगर सूर्य बाद में बनाया तो दिन की पहचान कैसे की ,वाह क्या बात है साहब पंडित ,मुझे फिर एक गंवार चुटकला याद आरहा है वह यह कि गाँव का एक लड़का शहर से ग्रेजुऎशन कर के अपने गावँ पहुंचा तो गॉँव मै उसकी पढाई के चरचे थे एक गाँवदी को सूजी कि क्यों न उसकी परीक्षा ली जाए ,तो वह उसके पास पहुंचा और ज़मीन पर आड़ी टेढ़ी लकीर बना कर कहने लगा कि बताओ यह क्या है ,अब बेचारे ग्रेजएट साहब खामोश हो रहे और कहने लगे कि चाचा आप ही बतादें कि यह क्या  है  ,गाँवदी बोला के बनते ग्रेजुएेट हो और इतनी सी बात का भी नहीं पता कि यह बैल का मूत  है ,,,,अब इस से ज़्यादा इस गरीब पंडित पर फिर कभी लिखूंगा