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Wednesday, February 12, 2014

Book श्री नरेन्द्र मोदी और मुसलमान

Book श्री नरेन्द्र मोदी और मुसलमान
भारतीय मुसलमानों का बी. जे. पी. से 36 का आँकडा है। कुछ उपवादों को छोड़कर मुसलमान इस पार्टी से दूरी बनाये रखते हैं जो इक्का-दुक्का मुसलमान बी. जे. पी. के साथ जाते हैं वह मुस्लिम समाज में अपनी साख खो देते हैं। इसका कारण बहुत स्पष्ट है । 2014 के पार्लीमानी चुनाव के लिये इस पार्टी ने पी. एम. पद हेतु गुजरात के मुख्य मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को अपना प्रत्याशी घोषित करके इस कारण को काफी स्पष्ट कर दिया है।

श्री नरेन्द्र मोदी हिन्दू समाज के एक विशेष वर्ग के हीरो हैं। वह इस वर्ग के दिल की धड़कन और आँखों की चमक बन गये हैं। अपनी पार्टी में उन्‍हों ने बड़े-बड़े लीडरों को पीछे छोड़ दिया है। जिन्‍होंने पार्टी का इकबाल बुलन्द करने में बड़ा योगदान दिया था उन सभी को दरकिनार करते हुये पार्टी के निर्णायकों ने मोदी को पार्टी की ओर से भावी प्रधानमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट किया है। कारण यह है कि पार्टी वर्कर्स और बहुत से बुद्धिजीवी, धर्म गुरू और एक विशेष विचार धारा में आस्था रखने वाले एक-एक व्यक्ति की ज़ुबान पर नमो नमो के सिवा कुछ सुनाई नहीं पड़ता । उनकी पार्टी में बड़े-बड़े विद्वान, बुद्धिजीवी, लेखक, विधिविनायक यहाँ तक कि राजनीति में मोदी के गुरू भी विद्यमान हैं जिन्‍हों ने राजनीति की बिसात पर मोदी को उंगली पकड़कर चलना सिखाया है और राजनीतिक आपदाओं में उनके लिये संकट मोचक साबित हुए हैं।

यह विशेष वर्ग मोदी को जितना प्यार करता है, उनमें अपनी आस्था प्रकट करता है और उन्हें अपना हीरो मानता है, उसी पैमाने पर भारत का समूचा मुस्लिम समाज मोदी से नफ़रत करता है। उन्हें अपना राजनीतिक विरोधी ही नहीं मूल ‘शत्रु समझता है जिसका कारण 2002 के गुजरात दंगों में एक मुख्यमंत्री के बतौर नरेन्द्र मोदी का रवैया और उसके बाद बराबर मुस्लिम समाज की उपेक्षा और अल्पसंख्यक समाज के विरोध में उनके द्वारा प्रकट होने वाली उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षाएँ उसके कारण हैं। जहाँ तक दंगों की बात है, कांगे्रस के राज में गुजरात से भी भयानक स्तर के दंगे हुये हैं, लेकिन जिस प्रकार मोदी के राज में सरकारी छत्रछाया में गुजरात दंगा हुआ उसकी मिसाल नहीं मिलती।
स्पष्ट है कि मुस्लिम विरोध और खुली मुस्लिम दुश्मनी नरेन्द्र मोदी की एक महत्वपूर्ण विशेषता है जो उन्हें दूसरों से अलग करती है और यह हमारे देश के बहुसंख्यक समुदाय के एक विशेष वर्ग की पहली पसंद है। मोदी ने गुजरात में मुसलमानों का क़त्ल-ए-आम करने के साथ-साथ अन्य मुस्लिम विरोधी कार्य न किये होते तो वह भी मध्य प्रदेश के ‘‘शिवराज’’ और ‘‘छत्तीसगढ़’’ के ‘‘रमन सिंह’’ की तरह अपनी पार्टी की दूसरी पंक्ति के लीडर होते। उन्होनें अन्यों के मुक़ाबले कोई ख़ास विकल्प प्रस्तुत नहीं किया है। खोख़ली बयानबाजी़, बेतुकी इल्ज़ाम तराशी, शब्दों की छींटाकशी और विरोधियों को गाली देने के सिवा उनके पास कुछ और नहीं है।
मोदी की मुस्लिम उपेक्षा
मोदी के भक्तों ने मोदी-प्रेम प्रकट करने के लिये गुजरात विकास का फर्ज़ी नारा घड़ा है जबकि ब्ण्ण्ळ की रिपोर्ट के अनुसार गुजरात का हर तीसरा बालक कुपोषण का शिकार है और डेढ़ करोड़ लोगों के पास रहने के लिये पक्का घर नहीं है। भ्रष्टाचार और साम्प्रदायिक हिंसा के मामलों में मोदी के कई मंत्री जेल जा चुके हैं। ऐसी स्थिति में यह कैसे मान लिया जाये कि मोदी ने गुजरात को उन्नति के शिखर पर पहुँचा दिया है। रही बात मुसलमानों की उपेक्षा करने की उसके लिये इतना ही काफी है कि मोदी गुजरात के दस प्रतिशत मुसलमानों में किसी को इस लायक नहीं समझते जिसे उनकी पार्टी असेम्बली चुनाव में टिकट दे सके और यह तो उनके लिये बहुत छोटी बात है कि केंद्रीय सरकार की छात्रवृत्ति वितरण स्कीम के अन्तर्गत जब उनके प्रांत में मुसलमान छात्रों के लिये केन्द्र से धन आया तो उन्होंने इसे मुस्लिम छात्रों तक नहीं जाने दिया। यहाँ तक कि मोदी सरकार के इस रवैये को उच्च न्यायालय में चैलेंज किया गया और न्यायालय ने मोदी सरकार को यह आदेश दिया कि वह मुस्लिम छात्र छात्राओं को छात्रवृत्ति का धन वितरित करे। मोदी सरकार ने इस आदेश का पालन करने के बजाय इसे उच्चतम न्यायालय में चैलेंज कर दिया जिसका अर्थ यह है कि नरेन्द्र मोदी मुसलमानों के साथ व्यक्तिगत ‘शत्रुता का रवैया बनाए रखना चाहते हैं। उनकी यह शत्रुता बात-बात में प्रकट होती रहती है।
स्वयं उन्हीं के बकोल उनके नज़दीक मुसलमानों की हैसियत कुत्ता-बिल्ली सरीखे जानवरों से अधिक नहीं। 2002 के गुजरात दंगों से प्रभावित जिन गरीब मुसलमानों ने कैम्पों में पनाह ली थी ऐसे कैम्पों को मोदी बच्चा पैदा करने के कारखाने और मुसलमान बच्चों को वह अनेक बार साईकिल में पंक्चर लगाने वालों की फौज कह चुके हैं। मज़लूम मुसलमानों के साथ उन्होंने जो रवैया बनाये रखा था उस पर उन्हें खुद उन्हीं की पार्टी के प्रधानमंत्री राजधर्म निभाने की नसीहत दे चुके हैं। गुजरात दंगों पर अपनी टिप्पणी में उच्च न्यायालय ने उन्‍हों ने मॉडर्न नीरू की उपाधि दी थी। उनके राज में स्वयं उनके इशारे पर मुसलमान बच्चों और बच्चियों के जो फर्ज़ी एन्काउंटर सामने आये हैं वह दुनिया जानती है। मोदी स्वयं को कट्टर हिन्दूवादी नेता मानते और कहते हैं लेकिन यह उनकी कोई खास विशेषता नहीं है। हिन्दू कट्टरवादी नेता तो उन सभी पार्टियों में भी बहुत हैं जो स्वयं को धर्म निरपेक्ष कहती हैं और मेरे ख्याल में कट्टर हिन्दूवादी होना कोई निर्गुण भी नहीं है। वास्तव में मोदी ने हिन्दू कट्टरवादी होने के साथ अपनी छवि मुस्लिम शत्रु की भी बनायी है और वह उसे बनाए रखना भी चाहते हैं। उनकी यही विशेषता उन्हें दूसरों से अलग करती है और उनकी यही विशेषता है जो उन्हें हीरो बनाती है क्योंकि यह एक विशेष वर्ग के दिल की आवाज़ है। मुसलमानों पर अगर शिकंजा कसा जाये तो इस विशेष वर्ग की आत्मा को शान्ति मिलती है और मोदी इस हुनर से बखूबी वाक़िफ हैं इसलिये यह विशेष वर्ग मोदी को सिर-आँखों पर बिठाये हुए है और पार्टी के बड़े-बडे़ दिग्गजों को छोड़कर वह मोदी पर फिदा है और रात दिन नमो नमो की माला जपता है। परन्तु इस दौर में राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जो ह़ालात हैं उनमें मोदी की उक्त जैसी विशेषताओं का खुल्लम-खुल्ला गुणगान नहीं किया जा सकता अतः मोदी प्रेमियों ने इसके लिये एक विशेष परिभाषा का निर्माण किया है और वह है ‘‘गुजरात का विकास मॉडल।’’ यह मोदी प्रेमियों का विशेष कोडवर्ड है वरना जहाँ तक गुजरात के विकास की बात है स्वयं उन्हीं की पार्टी के शीर्ष लीडर एल के अड़वाणी ऐलानिया यह बात कह चुके हैं कि शिवराज सिंह के नेतृत्व में मध्य प्रदेश ने गुजरात से भी अधिक उन्नति की है। जहाँ तक मोदी के तीन तीन बार चुनाव जीतने की बात है तो यद्यपि अल्पसंख्यक समुदाय को विलेन बनाकर और उसके विपरीत बहुसंख्यक वर्ग की भावनाओं को भड़काकर सत्ता हथियाना प्रजातांत्रिक राजनीति का सस्ता सौदा है जिसका तजुर्बा सबसे पहले इटली में ‘‘हिटलर’’ ने किया था और उसी तजुर्बे को मोदी ने गुजरात में आज़माया है। इस आसान फार्मूले के पहले तजुर्बेकार का संसार में क्या हश्र हुआ उससे क़ता नज़र, कोई भी सद्बुद्धि रखने वाला इंसान यह कह सकता है कि खूनी राजनीति का यह शार्टकट जिसमें इंसानी लाशों पर सियासत की दीवार खड़ी की जाये, एक घटिया प्रकार की राजनीति है जिसे फासीवादी राजनीति का नाम दिया जाता है और फासीवादी राजनीति का अन्त इस प्रकार होता है कि वह स्वंय अपने हाथों अपने जीवन का खात्मा कर लेती है क्योंकि इंसानों की लाशों पर रक्त-रंजित राजनीति की आयु अधिक नही होती और प्रकृति स्वयं उससे हिसाब चूकता कर लेती है। बहरहाल मोदी जिस प्रकार अपनी ही प्रजा के समुदाय विशेष के खिलाफ शत्रुता पर आधारित बहुसंख्यकीय भावनाओं को भड़काने वाली सस्ती राजनीति करते हुये तीन-तीन योजनाओं से सत्ता पर बने हुये हैं उसे किसी सत्ताधारी का राजधर्म नहीं कहा जा सकता।
इसके अतिरिक्त भारत में ऐसे-ऐसे मुख्यमंत्री भी मौजूद हैं जो अपने-अपने प्रदेश के लगातार तीन-चार और पाँच-पाँच बार मुख्यमंत्री चुने जाते रहे हैं, परंतु उनकी यह लोकप्रियता मोदी मित्रों के लिये कभी आकर्षण का विषय न बन सकी। स्वयं उनकी पार्टी के शिवराज सिंह जो मध्य प्रदेश के लगातार दो से अधिक बार मुख्यमंत्री चुने गये और अडवानी जी के बक़ौल उनके नेत्रत्व में मध्य प्रदेश ने गुजरात से अधिक तरक्‍की की है वे कभी इन लोगों के दिल की ऐसी धड़कन नही बन सके क्योंकि उनकी भाजपा वाली कट्टरता, मुस्लिम शत्रुता तक नहीं जाती। इसलिये उनमें और उन जैसे और कई लीडरों में इस वर्ग की कोई दिलचस्पी नहीं है।

हिन्दूवादियों का मोदी प्रेम
प्रश्न यह है कि यह विशेष वर्ग मोदी के मुस्लिम शात्रुता वाले उनके रवैये पर इस क़दर मोहित क्यों है कि बड़े-बड़े विद्वानों, विचारकों और बुद्धिजीवियों और पार्टी के लिये जीवन भर की क़ुर्बानी देने वालों को छोड़कर यह वर्ग मोदी को देश के सबसे शीर्ष पद पर देखना चाहता है। आखिर क्या कारण है कि जो लीडर मुसलमानों से खुली शात्रुता (मोदी पढ़िये) दिखाता है वह इस वर्ग के हृदय में क्यों बैठ गया है। अर्थात इस वर्ग को मुस्लिम समाज से इतनी नफरत है कि जो उनसे खुली शत्रुता दिखायेगा वह उसके हृदय की आवाज बन जायेगा क्योंकि कहावत मशहूर है कि शात्रु का शत्रु दोस्त होता है’’। मुसलमान जो इस देश की एक बड़ी आबादी और देश का अभिन्न अंग है उससे इस विशेष वर्ग की यह शत्रुता क्या समाज और देश के लिये कोई अच्छा संकेत है? आपका इस बारे में क्या ख्याल है कि दस व्यक्तियों का एक समूह है जिनमें के छः व्यक्ति चार की उपेक्षा करते हैं उनका अपमान करते हैं अपने संखीय बल से उन पर दबाव बनाये रखना चाहते हैं जबकि स्थिति यह है कि आम जीवन में न तो चार का छः के बगैर काम चल सकता है और न छः का चार के बगैर। ख्याल रहे कि भारत वर्ष के अधिक भू-भाग मंे मुसलमानों की जो आबादी है उसके मद्दे नज़र यह कहा जा सकता है कि शायद कोई हिन्दू ऐसा न हो जिसे अपने जीवन में कभी किसी मुसलमान से सरोकार न रहा हो और यही बात मुसलमानों की हिन्दुओं के सम्बन्ध में है। चाहे वह व्यापार के सम्बन्ध का सरोकार हो या मेहनत मज़दूरी का या मानव जीवन की अन्य आवश्यक्ताओं का। ऐसी स्थिति में अगर एक समुदाय दूसरे से शत्रुता का भाव प्रकट करके यह समझता है कि उससे केवल दूसरे पक्ष की ही हानि होगी और उसे इसका कोई नुक़सान नहीं पहुँचेगा तो यह उसकी सरासर भूल है।
भारत का मुसलमान इसी समाज का हिस्सा है, उसकी रगों में भी उन्ही पूर्वजों का खून दौड़ता है जो अन्य भारतीयों की रगों में  है। भारतीय मुसलमानों की अधिक संख्या उन्हीं ज़ात बिरादरियों से सम्बन्धित है और उन्ही नामों से पुकारी भी जाती हैं। अन्य मुसलमान भी कई सदियों से यहीं रहते आये हैं उन्होंने भारत को अपना वतन माना है। देश के बँटवारे के समय उनके पास विकल्प था परन्तु उन्होंने भारत की धरती को नहीं छोड़ा और यहीं रहना पसन्द किया, परन्तु क्योंकि वह अल्पसंख्यक है अतः उन्हें डराया धमकाया जा सकता है उन्‍हें विलेन के रूप में प्रस्तुत करके अपनी सियासत की दुकान चलाई जा सकती है। क्या यह एक अच्छा ख्याल है? बहुसंख्यक समुदाय के उस विशेष वर्ग को जो मोदी मोहित है उसको यह विचार करना चाहिये कि वह मोदी प्रेम के द्वारा यह प्रकट कर रहा है कि उसे मुस्लिम समाज से बेवजह की शात्रुता है और जो लीडर उनसे शत्रुता का खुला सुलूक करे वह उनके लिये किसी महबूब से कम नहीं। जो लीडर मुसलमानों को मारने, काटने की बात करे वह इस वर्ग के दिल की आवाज़ क्यों बन जाता है? बी जे पी के एक बड़बोले नौजवान लीडर ‘‘वरूण गाँधी’’ ने कुछ दिनों पहले अपने भाषण में मुसलमानों की गर्दन उडाने और उनके हाथ काटने की बात की थीं जिस कारण वह जेल अवश्य चले गये थे परन्तु मुस्लिम दुश्मनी पर आधारित केवल दो शाब्द बोलकर वह रातों-रात बी जे पी के स्टार कम्पेनियन भी बन गये थे। यह बातें एक विशेष वर्ग की मानसिकता को समझने के लिये काफी हैं । क्या यह वर्ग समझता है कि शात्रुता मेल-मिलाप से बेहतर है। आपसी रंजिश और नफरत भाई-चारे से बेहतर है या वह समझता है कि अब मौक़ा उसके हाथ है तो वह अपने इस रवैये से मुसलमानों को निकाल बाहर करेगा। अगर वह ऐसा समझता है तो वह दीवार पर लिखा नहीं पढ़ रहा है और समाज व राष्ट्र को पीछे की ओर खींचने का प्रयास कर रहा है।

भारत में मुसलमान
भारत एक विशाल देश है जिसकी आबादी एक अरब से ऊपर है। मुसलमान भी यहाँ की एक बड़ी आबादी है। एक अंदाज़े के अनुसार यहाँ पर उनकी संख्या बीस करोड़ से ऊपर है। कहने को यहाँ पर मुसलमान 15 प्रतिशत हैं लेकिन यह कुल भारत की बात है। स्थिति यह है कि कुछ क्षेत्रों में वह न के बराबर हैं और कुछ में एक या दो प्रतिशत हंै परन्तु एक बडे़ भू-भाग में और देश के महत्वपूर्ण राज्यों में महत्वपूर्ण स्थानों पर बड़ी संख्या में हैं। कुछ क्षेत्रों में 40-50 प्रतिशत भी हैं और कुछ क्षेत्रों में बहुसंख्यक भी हैं। इतनी बड़ी कम्युनिटि और इस प्रकार की आबादी की उपेक्षा कर, उस पर दबाव बनाकर उसको विलेन के तौर पर प्रस्तुत करने वाली राजनीति कर बहुसंख्यक समाज का कोई विशेष वर्ग अगर यह समझता है कि वह देश या समाज की कोई बड़ी सेवा कर रहा है तो वह पागलों की दुनिया में जी रहा है जिसने अभी तक सच्चाई को स्वीकार नहीं किया है और सच को स्वीकार न करना प्रकृति से टक्कर लेना है और जो प्रकृति से टकराता है वह केवल अपना सर ही फोड़ सकता है। प्रकृति का रूख नहीं मोड़ सकता। आज का भारत नवयुग का भारत है जो केवल हिन्दुओं का नहीं मुसलमानों का भी है, सिखों का, ईसाईयों का और अन्य धर्मावलम्बियों का भी है परन्तु यह विशेष वर्ग समझता है कि वे एक हज़ार साल पहले दौर में जी रहा हैं जहाँ उसकी कल्पना के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य की सरकार है और चाणक्य नीति से वह सबको पीछे की ओर धकेल देगा।
किसी बुद्धिमान का कथन है कि सत्य जहाँ भी मिले, जितना जल्द हो सके उसे स्वीकार कर लेना चाहिये, परन्तु जो सत्य को स्वीकार न करे, उसके स्वीकार न करने पर भी सत्य सत्य ही रहता है, असत्य नहीं हो जाता है। आज का हिन्दुस्तान किसी विशेष जाति-धर्म का भारत नहीं है अपितु भिन्न-भिन्न जाति धर्मों और समुदायों का देश है। जैसे यह हिन्दुओं का देश है ऐसे ही मुसलमानों का भी है। इसके संसाधनों पर जैसे अन्य भारतीयों का अधिकार है ऐसे ही मुसलमानों का भी अधिकार है। अगर आप यह समझते हैं कि मुसलमानों को उनका अधिकार न देकर आप देश को ऊँचाईयों पर ले जायेंगे तो यह आपकी भूल है।
 यहाँ यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि हिन्दूवादियों की एक संस्था जो स्वयं को सबसे बड़ा राष्ट्रभक्त समझती है उसका लिटरेचर पढ़कर लगता है कि वह जी जान से इसी नाकाम प्रयास में लगी हुई है। दरअसल बीसवी ‘ाताब्दी की प्रथम चैथाई में जब देश अंग्रेजों से आज़ादी प्राप्त करने की ओर तेज़ी से बढ़ रहा था। उस समय एक विशेष विचार धारा के कुछ ऐसे लोग भी सामने आये जो आज़ादी की सुबह का उदय होते देख देश और राष्ट्र के तार एक हजार वर्ष पहले के भारत से जोड़ना चाहते थे। उनकी नज़र में देश पर मुसलमानों की हुकूमत का दौर किसी कलंक से कम नहीं था और उन्‍होंने इस कलंक को मिटाने के नाकाम प्रयास भी किये जिसमें उन्होंने चाणक्य नीति के मशहूर नियम साम, दाम, दण्ड, भेद का भी भरपूर प्रयोग किया। यह अलग बात है कि नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले इस समूह ने इस ओर कभी ध्यान नहीं दिया कि अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिये साम, दाम, दण्ड, भेद का हर अच्छा, बुरा व सही, गलत तरीका अपनाना कौन सी नैतिकता है?
बहरहाल शायद अब समया आ गया है कि यह विशेष वर्ग अपने दृष्टिकोण पर पुनः विचार करे क्योंकि इतिहास के चक्र को उल्टा नहीं घुमाया जा सकता। ऐतिहासिक तथ्यों का इन्कार कैसे किया जा सकता है, क्योंकि इतिहास सत्य होता है और सत्य को स्वीकार करना ही अकलमन्दी है।

‘‘हिन्दुस्तान’’ या ‘‘हिन्दूस्थान’’
भारत वासियों के लिए हिन्दू, और भारत के लिए हिन्दुस्तान, यह दोनों ‘ाब्द ऐसे हैं जो कदीम हिन्दुस्तानी साहित्य या भारतीय इतिहास पुस्तकों में कहीं नहीं मिलते हैं इन दोनों शब्‍दों का प्रयोग बाहर से आने वाले मुस्लिम हुक्मरानों ने किया था । यहाँ के सभी निवासियों को उन्होंने हिन्दू कहा और भारत देश को हिन्दुस्तान, सितां फारसी भाषा का शाब्द है जिसके माना बागीचा के होते हैं जो खुशहाली का प्रतीक है। हिन्दू शाब्द भोगोल सूचक था । जिसके साथ सितां शाब्द जोड़कर उन्होंने भारत देश का नाम रखा । इस प्रकार यह दोनों शाब्द हिन्दुवादियों की दृष्टि में बाहरी लोगों के दिये हुए हैं। लेकिन यह हिन्दुवादी जो बात-बात में स्वदेशियत का बखान करते हैं जिन्हें भारत को इन्डिया कहना गुलामी का प्रतीक नज़र आता है उन्हें इन दोनों शाब्दों से बड़ा प्यार है और तथाकथित बाहरी लोगों द्वारा दिये ये नाम उन्हें स्वदेशी नहीं पूर्ण देशी नज़र आते हैं। हिन्दुस्तान शाब्द की फारसियत को दरकिनार करते हुए अब उन्होंने उसमें हिन्दुवियत पैदा कर ली है और वे हिन्दुस्तान को हिन्दूस्थान लिखते और बोलते हैं। और अपनी संर्कीण दृष्टि पर अड़ित दिखाई पड़ते हैं कि हिन्दुस्तान पर केवल हिन्दुओं का अधिकार है

हिन्दूवादियों में मोदी लहर
यह सच है कि हिन्दुत्व वादियों में मोदी की लहर है और वह नमो नमो का बखान कर रहा है। सच यह है कि मोदी की एक बड़ी विशेषता है जो उन्‍हों अन्यों से अलग करती है वह है मुसलमानों के लिये उनका आक्रामक रूख। उनकी मुस्लिमों से इस हद तक नफरत है कि वह स्टेज पर भी मुसलमानों का प्रतीक टोपी1 अपने सर पर रखने से साफ इंकार कर देते हैं। वह साम्प्रदायिक दंगों में अपनी पुलिस और अपने अधिकारियों को यह हिदायत दे सकते हैं कि अधिक सतर्कता मत दिखाना और हिन्दू समुदाय को मुसलमानों पर हमला करने में थोड़ी छूट दे देना 2,  वह यह कर सकते हैं कि केन्द्र से आने वाली मुस्लिम बच्चों की छात्रवृत्ति के धन को रूकवा सकते हैं। यहाँ तक कि माननीय हाई कोर्ट भी अगर मुस्लिम छात्र-छात्राओं में इस धन को बाँटने का आदेश करे तो वह उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जा सकते हैं। फिर सुप्रीम कोर्ट भी उन्हे मुस्लिम बच्चों की छात्रवृत्ति वितरण का आदेश करे, तो वह पटीशन को रिविज़न में ले जा सकते हैं। यह सब उन पर केवल इल्ज़ाम नहीं विख्यात सत्यता है। यह सब बातें ऐसी हैं जिनका (कम से कम) इस आधुनिक समय में खुलकर समर्थन नहीं किया जा सकता इसलिये मोदीवादियों ने इसे एक सुन्दर नाम दिया है और वह नाम है ‘‘विकास का गुजरात मॉडल’’-जहाँ तक गुजरात विकास की बात है बेहतर हो । इस पर कोई बात न की जाए। क्योंकि गुजरात एक ऐसा राज्य है जो अतीत से ही अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा विकासशील रहा है। उसके कुछ कारण भी हैं यह प्रांत समुद्री तट पर होने के कारण अतीत में भारत की एक बडी़ बन्दरगाह का क्षेत्र रहा है जो विदेशों से आवाजाही का एक बड़ा केन्द्र था। आधुनिक युग में विदेशों में जो उन्नति हुई अतीत में भी उसका प्रभाव बहुत पहले गुजरात में नज़र आया है। भारत में अंग्रेजों के समय में कपड़ा मिल सबसे पहले गुजरात में स्थापित किया गया था। गुजरात विकास में जितना पहले अग्रसर था उतना ही आज भी है। उसमें मोदी ने इतना इज़ाफा किया है कि अब वहाँ के मुसलमान बच्चों को छात्रवृत्ति तक नहीं मिलती। अब वहाँ का मुसलमान नñ 2 का शाहरी बनकर जीवन व्यतीत करता है।
यक़ीनन यह शाब्द आपको बुरे लगे होंगें मगर ठहरिये! मैं आपकी चिंता दूर करता हूँ। गुजरात में क़रीब दस प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। अब अगर आप इस वास्तविक्ता को स्वीकार करते हैं कि भारत में आबाद मुसलमान भी इसी धरती का वासी है और इसके संसाधनों पर उसका भी उतना ही अधिकार है जितना किसी अन्य का, तो फिर आपको यह भी मानना होगा कि आबादी के अनुसार सत्ता में हिस्सेदारी भी उसका बुनियादी अधिकार है। किसी भी प्रांत की एसेम्बली सत्ता का केन्द्र होता है। एसेम्बली या पार्लियामेंट से मुसलमानों को दूर रखने के लिये यह कुछ कम बात न थी कि मोदी की पार्टी बी जे पी एक दो ऐसे मुसलमानों की तलाश कर लिया करती थी। जिन्हें मुसलमानी की जरा भी हवा न लगी हो, परन्तु मोदी ने एक क़दम आगे बढ़ाते हुए यह निर्णय लिया कि उनकी पार्टी से कोई मुसलमान, नाम को भी विधान सभा में नहीं आयेगा। अतः वह गुजरात एसेम्बली में भूलकर भी किसी मुसलमान नाम के व्यक्ति को टिकट नहीं देते बल्कि अपने भाषण में मुसलमान नामों को विलेन के बतौर इस्तेमाल करते हैं1 और मोदी की यही वह अदा है जो मोदी वादियों को मुग्ध कर देती है और वह मोदी मोहित हो जाते हैं। क्या यह कोई अच्छा दृष्टिकोण है कि आप हकदार को उसका हक न दें? क्या आपने अभी तक यह स्वीकार नहीं किया कि भारत की इस पावन धरती पर मुस्लिम कम्युनिटि भी बराबर का अधिकार रखती है। अगर अभी तक आपने यह स्वीकार नहीं किया तो आप दीवार पर लिखा नहीं पढ रहे हैं। आप भरी दोपहर में सूर्य के अस्तित्व का इंकार कर रहे हैं। अर्थात आप सत्य को स्वीकार नहीं कर रहे हैं और जो सत्य को स्वीकार न करे, वक्ती चमक-धमक चाहे उसकी आँखों को चकाचैंध कर दे अन्ततः उसका परिणाम गलत ही निकलता है।
मोदी एक दूसरी पंक्ति के लीडर इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि नरेन्द्र मोदी अपनी पार्टी के भीतर, एक दूसरी पंक्ति के नेता थे उनकी पार्टी में पहली पंक्ति के ऐसे ऐसे लीडर विद्यमान हैं जिन्होंने मोदी को उंगली पकड़कर राजनीति के पथ पर चलना सिखाया है जो बुद्धि, ज्ञान और सामाजिकता में उनसे ऊपर हैं और उनसे कहीं अधिक योग्य हैं। इसके बावजूद पार्टी विधाताओं ने उन्हें दूसरी पंक्ति से उठाकर पहली पंक्ति के शीर्ष पर बैठाया है। उन्हें यह रूतबा केवल उनकी एक विशेषता के कारण मिला है और वह है उनकी कट्टरता परन्तु उनमें यह कट्टरता केवल मुस्लिम विरोध में  है। स्वधर्म के आधार पर नहीं। जहाँ तक स्वधर्म की बात है इस हवाले से हम कह सकते हैं कि मोदी सिरे से धार्मिक व्यक्ति ही नहीं हैं अपितु कड़वा सत्य यह है कि मोदी धर्म को पेशाब पर रखते हैं। क्या यह बात कड़वी लग रही है? या आप इसे केवल एक आलोचक का इल्ज़ाम समझ रहे हैं? तो ठहरिये! मैं आपको याद दिलाता हूँ कि मोदी जी ने कुछ दिनों पहले अपने एक मशहूर भाषण में ‘देवालय’ से पहले शौचालय’ की जो बात कही थी वह तो आपको याद होगी? क्या मोदी जी ने देवालय की शौचालय से बेतुकी तुलना करके धर्म को पैशाब पर नहीं रख दिया है।
प्रश्न यह है कि ऐसा व्यक्ति जो समुदाय विशेष के विरोध में कट्टरता के शीर्ष पर बैठा है उसे राजनीति में आप आँखों में बैठाकर समुदाय विशेष को क्या पैग़ाम देना चाहते हैं? यही न कि समुदाय विशेष अर्थात मुस्लिम समाज आपको स्वीकार नहीं है। अब देखना यह है कि बहुसंख्यक वर्ग मोदी को स्वीकार करके अगर इस प्रवृति को मान्यता देता है तो मुस्लिम समाज में इसका क्या संदेश जायेगा? और उसका जो प्रभाव होगा क्या वह देश के हित में है? क्योंकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आप स्वीकार करते हैं या नहीं। परन्तु यह सत्य है कि मुस्लिम समुदाय भारतीय समाज का हिस्सा है और कोई भी समाज अपने एक विशेष भाग को अपने संसाधनों पर बराबर के अधिकार से वंचित रखकर स्वयं भी महानता का दावा नहीं कर सकता। अगर कोई परिवार अपने ही कुछ सदस्‍यों का बाइकाट करके यह समझें कि वह स्वयं चैन की नींद सो सकेगा तो यकीनन यह उसकी नासमझी होगी। बेहतर समाज वह है जिसमें सबको अपना हिस्सा मिले यह कहावत तो आपने सुनी ही होगी कि ‘‘कलीसा का हिस्सा कलीसा को दो और रोम का हिस्सा रोम को’’। परन्तु समय के हजार थपेड़े खाकर भी एक विशेष मानसिक प्रवृति के लोग अपनी बात पर अडे़ हुये हैं और वह सस्ती राजनीति करके सत्ता की गद्दी हथियाना चाहते हैं। यह विशेष वर्ग भारत की सैक्युलर राजनीतिक पार्टियों को अक्सर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का ताना देता रहता है। जबकि यह सब कुछ अगर तुष्टिकरण है तो उसे यह मालूम होना चाहिये कि वह बहुसंख्यक तुष्टिकरण का शिकार होता है और यही वह रास्ता है जो सस्ती राजनीति से आरम्भ होता है और ‘‘फासीवाद’’ पर समाप्त होता है।
स्पष्ट है कि जो अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करेगा उसे अगर बदले में कुछ मिला भी तो वह अल्प में ही होगा। इस की अपेक्षा बहुसंख्यक तुष्टिकरण पर आधारित राजनीति में अधिक हाथ आने की संभावना है परंतु यह भारतवासियों विशेषकर बहुसंख्यक हिन्दू समाज की महानता और उसके हृदय का बड़ापन है कि उसने आज़ादी के बाद से आज तक उस संकीर्ण मानसिकता को पूर्ण रूप से मान्यता नहीं दी जो दूसरों को स्वीकार करने पर आमादा नहीं है परंतु क्या अब समय परिवर्तित हो गया है? क्या अब मोदी जैसा व्यक्ति जो देवालयों को पैशाब पर रखता हो वह भारत जैसे अध्यात्मिक देश का प्रधानमंत्री बनेगा? बहुसंख्यक हिन्दू समाज के एक विशेष वर्ग में जो मोदी का तूफान खड़ा किया गया है उसे देखकर तो यही लगता है। परन्तु अगर ऐसा हुआ तो हमें यह मान लेना चाहिये कि यह देश ‘‘फॉसिज़्म’’ की ओर जा रहा है और ‘‘फॉसिज़्म’’ वह बला है कि उसने जिस को अपनी लपेट में लिया है उसे तबाह करके छोड़ा है।

फॉसिज़्म क्या है?
कमज़ोर की ताकतवर से कोई तुलना नहीं की जा सकती। ताक़तवर को आता देख कमज़ोर को रास्ता छोड़ना पड़ता है यह प्रकृति का नियम है कि बड़ी मछली छोटी को खा जाती है। अल्पसंख्यक वर्ग और बहुसंख्यक वर्ग की कहानी कम से कम भारत में तो ऐसी ही है। बहुसंख्यक वर्ग के पास सत्ता होती है ताक़त होती है तथा साधन होते हैं। उसके पास सबसे बड़ी शाक्ति संख्याबल की होती है वह अगर उग्र हो जाये तो उसे शाक्ति से दबाना संभव नहीं। यहाँ तक कि न्यायालय भी उसके आगे बेबस दिखाई पड़ता है। उसका एक उदाहरण ‘‘अयोध्या’’ प्रकरण है इसे अलग रखते हैं कि वहाँ मंदिर है या मस्जिद। उसका मामला न्यायालय में था और न्यायालय को यह भरोसा दिलाया गया था कि विवादित ढ़ाँचा सुरक्षित रहेगा परन्तु उसे टूटते हुये सम्पूर्ण संसार ने देखा और तोड़ने वालों को न तो सरकार रोक सकी न न्यायालय उन्‍हें कोई सज़ा दे सका। भारत का अदालती निज़ाम निष्पक्ष कार्य करता है और उक्त प्रकरण में उस समय के यू.पी. के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को जिन्होंने न्यायालय के समक्ष विवादित ढाँचे को सुरिक्षत रखने का हल्फनामा जमा किया था उन्हे केवल एक दिन की सज़ा सुनाई थी। ऐसे मौकों पर हमें न्यायालय की कुछ मजबूरियाँ दिखाई पड़ती हैं जो ‘‘फासीवाद’’ का परिणाम होती हैं। तात्पर्य यह है कि अल्पसंख्यक अर्थात कमजोर अगर उग्र हो जाये तो उसे ताक़त से दबाया जा सकता है और उस पर न्यायालय का शिकंजा भी कसा जा सकता है परन्तु बहुसंख्यक के उग्र को शाक्ति से नहीं दबाया जा सकता जबकि न्यायालय के सामने भी बहुत सी मजबूरियाँ आन खड़ी होती हैं। अर्थात यह कहा जा सकता है कि अल्पसंख्यक अगर उग्र हो जाये तो उसे ‘उग्रवाद’ कहा जाता है और अगर बहुसंख्यक उग्र हो जाये तो वह ‘फासीवाद’ है। इसका एक अन्य उदाहरण देखिए, हैदराबाद के एक मुस्लिम लीडर ने हेट स्पीच दी तो वह सलाख़ों के पीछे चले गये जबकि उससे भी बढ़कर एक हिन्दू लीड़र हेट स्पीच करते रहते हैं उनके विरूद्ध मुक़दमात भी दर्ज होते रहे हैं परन्तु न तो सरकार उनका कुछ कर पाती है और न ही न्यायालय। यह कोई पक्षपात का विषय नही है बल्कि अगर ऐसे मामलों में कोई बड़ी कार्यवाही हो जाये तो उसके विरूद्ध बहुसंख्यक वर्ग में जो प्रतिक्रिया होगी उसे शान्त कर पाना बहुत कठिन होगा यह उसका विषय है।
कुछ ऐसा ही मामला अयोध्या की मस्जिद के विवादित ढाँचे को तोड़ने वालों का है जिनमें बड़े बड़े लीडर, धार्मिक गुरू और सामाजिक संगठनों के बडे़-बड़े नेता शामिल थे। यह अलग बात है कि वहाँ मंदिर होना चाहिये या मस्जिद। यह मुद्दा तो अभी न्यायालय के समक्ष था परन्तु जिन लोगों ने न्यायालय के नियम व क़ानून की अनदेखी करते हुए विवादित ढ़ाँचे को तोड़ दिया। इस प्रकार उन्होंने एक ढाँचे को ही नहीं गिराया बल्कि भारतीय संविधान को धराशायी कर दिया और न्यायालय की गरिमा को पैरों तले रोंद डाला, वह कानून देश के निर्माताओं द्वारा देश के लिये ही बनाया हुआ था और वह न्यायालय भी उन्हीं का था जिसने उन्हें इस बात का पाबंद किया था कि विवादित ढ़ाँचे पर कोई आँच न आये। परन्तु ऐसा नहीं हुआ और ऐसा करने वालों का आज दो दहाईयों के बाद भी कुछ नहीं बिगड़ सका। अदालत भी उनके सामने बेबस रही और सरकार भी।
हिन्दूवादियों का शौर्य दिवस
अयोध्या की यह घटना 6 दिसम्बर 1992 की है। आज स्थिति यह है कि दिसम्बर का महीना करीब आता है तो आम शाहराहों पर ‘‘हिन्दू ‘शौर्य दिवस 6 दिसम्बर’’ के बड़े बड़े बोर्ड़ लगाये जाते हैं, और ‘शौर्य जुलूस निकाले जाते हैं प्रश्न यह उठता है कि क्या क़ायदे क़ानून ताक पर रखकर न्यायालय को धता बताते हुये हिंसा और ज़ोर ज़बरदस्ती से कोई कार्य करना ‘शौर्य का प्रतीक है? दरअसल उनका यह कृत्य समुदाय विशेष का मुँह चिढ़ाने के लिये है और कमज़ोर का मुँह चिढाना ‘शौर्य नहीं कायरता है।
अरबी भाषा की एक कहावत मशहूर है जिसका अर्थ यह है कि घटिया इंसान को जब ताकत मिलती है तो वह अहंकारी हो जाता है और सत्ता मिलती है तो वह ज़ालिम हो जाता है। ‘शौर्य दिवस मनाने वाली भारतीय शूरवीरों की यह जमाअत दोनों बातों का सच्चा उदाहरण प्रस्तुत कर रही है।
कहा जाता है कि जो दूसरों पर एक उंगली उठाता है उसके हाथ की बाक़ी चार उंगलियाँ स्वयं उसी की ओर उठ रही होती हैं। अतः हम कह सकते हैं कि यह शूरवीर शौर्य दिवस के द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय को यह याद दिलाते हैं कि एक समय वह भी था जब तुम इतने ‘ाक्तिशाली और बहादुर और ‘शौर्यवान हुआ करते थे कि तुम्हारी मुट्ठी भर फौज ने हम बहुसंख्यकों के आस्था के केन्द्र पर बने धर्मस्थल को तोड़ कर उस पर मस्जिद का निर्माण कर दिया था, और बहुसंख्यक होते हुए भी हम इतने कायर और कमज़ोर थे कि हज़ारों वर्ष तक हमारा ‘शौर्य एवं हमारी शाक्ति स्वंय हमारा ही मुँह चिढ़ाती रही। फिर समय बदला(क्योंकि समय का नियम ही बदलाव है) और हमारी ‘शौर्य शाक्ति जाग उठी तो हमने न्यायालय और सरकार दोनों की अवहेलना करते हुये उस ढ़ाँचें को गिरा दिया जिसका मुद्दा अभी न्यायालय में विचाराधीन था, और हमने न्यायालय में यह शापथ पत्र प्रस्तुत किया था कि हम विवादित ढ़ाँचें को नहीं छेडेंगें। इस प्रकार हमने धोखे और छल करने में कोई कमी नहीं की जिसे हम कुछ अधिक बुरा भी नहीं समझते हैं।
‘शौर्य दिवस के जुलूस से वह यह भी याद दिलाते हैं कि यह तो समय-समय की बात है। कल सत्ता तुम्हारे पास थी और उस समय यह कौन सोच सकता था कि सत्ता परिवर्तन भी हो सकता है। परन्तु सत्ता परिवर्तन हुआ और अब सत्ता हमारे पास है और यह कल्पना कैसे की जा सकती है कि एक बार फिर सत्ता परिवर्तित हो सकती है परन्तु समय का तो नियम ही बदलाव है। अतः अगर समय ने फिर पल्टा खा लिया और सत्ता तुम्हारे हाथ आयी तो 6 दिसम्बर को याद रखते हुये जो कुछ हमने किया है वही सब तुम कर लेना।
यह भी कितना घटिया विचार है कि जिसके पास ताक़त और शाक्ति आ जाये वह भरपूर मनमानी करे। अगर भारतीय समाज इस विचारधारा को मान्यता दे रहा है तो फिर यह श्रंखला कहाँ रूकेगी? और जो इस विचारधारा को प्रोत्साहन दे रहे हैं क्या वह चाहते हैं कि हिंसा का यह सिलसिला यों ही चलता रहे कि जिसको जब और जहाँ अवसर मिले वह न्यायालय व सरकार आदि की कोई परवाह न करते हुए जो कुछ भी अपनी ‘ाक्ति के बल पर हो सकता हो वह करे। यह जंगलराज नहीं तो और क्या है?
प्रश्न यह भी है कि अगर अयोध्या के विवादित ढ़ाँचे को तोड़ना असंवैधानिक था तो इस कार्य को ‘‘‘शौर्य  दिवस’’ का प्रतीक बनाने की अनुमति देना क्या सरकारों की नीयतों के खोट को नहीं दर्शाता है?

अयोध्या में मन्दिर या मस्जिद!
यह इतिहास का विषय है कि क्या अयोध्या में राम जन्मभूमि मन्दिर था जिसे तोड़कर उसके ऊपर ही मस्जिद बनाई गई थी? यह विवाद उठने के बाद इस पर काफी चर्चाएँ हुई हैं और इस विषय पर काफी शोध भी हुआ है। इस छोटी सी पुस्तिका की तंगदामनी मुझे इस बात की अनुमति नहीं दे रही है कि मैं इस पर विस्तार से चर्चा करूँ, परन्तु इस विषय पर दो बातें अवश्य कहना चाहूँगा।
पहली बात यह कि इस मुद्दे पर उच्च न्यायालय का फैसला आ गया है और उसने विवादित भूमि को तीन स्थानों में बाँटते हुये एक हिस्सा मुसलमानों को मस्जिद बनाने के लिये और दो हिस्से हिन्दुओं को मंदिर के लिये दिये हैं। खास बात यह है कि न्यायालय ने अपने फैसले की बुनियाद वास्तविक तथ्यों से अधिक आस्था पर रखी है। इसका मतलब यह हुआ कि राम जन्मभूमि मन्दिर के संबन्ध में वास्तविक तथ्यों का अभाव है। जहाँ तक आस्था की बात है इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि आस्था सच्चाई से ऊपर नहीं हो सकती और जिस आस्था की बुनियाद झूट और अन्याय पर हो, वह आस्था नहीं ढ़ोंग है। इसका एक उदाहरण इस्लाम से पेश किया जा सकता है। मसलन एक मुसलमान की आस्था मस्जिद में होती है, नमाज़ में होती है, हज में होती है। अब अगर कोई इस आस्था की पूर्ति के लिये बिना इजाज़त या ताक़त के बल पर, ज़ोर ज़बरदस्ती से एक इंच ज़मीन लेकर भी वहाँ मस्जिद बना दे और उस पर नमाज़ पढ़े! या पैसा चुराकर हज को चला जाये तो इस्लाम की नज़र में न यह आस्था, आस्था है! न यह मस्जिद, मस्जिद है! और न यह हज, हज है।
अतः अगर तथ्यों से यह साबित हो जाता कि बाबरी मस्जिद किसी मन्दिर को तोड़कर बनाई गई थी तो देश का मुसलमान उससे दस्तबर्दार होने में देर न करता। परन्तु ऐसा नहीं हो सका बल्कि इसके विपरीत कुछ तार्किक तथ्य अवश्य सामने आते हैं। उदाहरण के बतौर एक ओर तो स्थिति यह है कि किसी भी समाज में किसी के जन्म स्थान को सुरक्षित रखने या उस पर यादगार बनाने का रिवाज नहीं है क्योंकि जब कोई बालक पैदा होता है तो किसी को उस समय यह ज्ञान होना संभव नहीं है कि यह बालक कोई महान व्यक्ति बनेगा अतः किसी भी समाज में जन्म स्थान को सुरक्षित रखने या उस पर यादगार बनाने का रिवाज नहीं है। अगर यह सत्य है तो फिर श्री राम का जन्म स्थान कैसे चिन्हित हुआ।
दूसरी ओर बाबर के सम्बन्ध से ऐसा नहीं लगता कि वह मन्दिर को गिराकर उस पर मस्जिद बनाने की अनुमति देता क्योंकि बाबर मुसलमान था और जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है कि इस्लाम क़तई इस बात की अनुमति नहीं देता कि आप किसी दूसरे व्यक्ति या समुदाय की ज़मीन पर मस्जिद का निर्माण कर दें।
दूसरी बात यह है कि बाबर का इतिहास पढ़कर नहीं लगता कि वह ऐसा घृणित कार्य करने की अनुमति दे सकता था। बाबर जिसने अपनी मशहूर रचना ‘‘तज़क-ए-बाबरी’’ में अपने बेटे ‘‘हुँमायूं’’ को नसीहत करते हुए लिखा है कि ‘‘भारतीय जनता का बहुसंख्यक वर्ग हिन्दू है जो गाय को पवित्र समझता है तुम अगर यहाँ हुकूमत स्थापित रखना चाहते हो तो गाय काटने की अनुमति मत देना।’’ प्रश्न यह है कि जो राजा इस हद तक संवेदनशील हो कि वह अपने राज्य में गाय काटने की मनाही इसलिये करे क्योंकि उसमें बहुसंख्यक वर्ग की आस्था है, क्या वह ‘‘राम जन्म भूमि’’ पर बने मंदिर को तोड़कर उस पर अपने नाम से मस्जिद बनाने की अनुमति दे सकता है?
एक अंतिम बात जो इस विषय पर कई प्रकार के प्रश्न खड़े करती है वह यह कि हिन्दूवादियों की यह जमाअ़त जो आज तक संसार को यह बात निश्चित करके नहीं बता सकी कि श्री राम का कार्यकाल कौन सा था? और श्री राम चार हज़ार साल पहले पैदा हुये हैं या चार लाख साल पहले? उसने राम के जन्म स्थान की एक-एक इंच जगह को निश्चित करते हुये यह चिन्हित कर दिया है कि राम अयोध्या में बनी मस्जिद के महराब के समीप बने हुये मिमबर की पहली पैड़ी पर मस्जिद के तीन गुम्बदों में से बीच वाले गुम्बद के एक दम नीचे पैदा हुये थे।
इसे कहते हैं चोरी और सीना जोरी। अगर आपके गली मौहल्ले में किसी ज़मीन पर दो व्यक्तियों के बीच विवाद हो जाये और दोनों उस पर अपना अपना दावा पेश करंे तो इसका हल क्या है? यही न कि अभियोग न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर दिया जाये परन्तु अगर किसी ऐसे मामले में एक पक्ष ज़ोर ज़बरदस्ती अपना अधिकार स्थापित करते हुए भवन का निर्माण कर उस पर ‘‘ ‘शौर्य के प्रतीक’’ का बोर्ड लगा दे तो ऐसे व्यक्ति के बारे में आपका क्या खयाल है? इसे ही तो जंगलराज कहा जाता है जहाँ कोई न्याय व्यवस्था नहीं होती बल्कि ताक़त की बुनियाद पर क्रियाएँ की जाती हैं अतः ताकतवर कमज़ोर को खा जाता है।
‘‘फासिज़्म’’ ज़ोर ज़बरदस्ती, धौंस और बल की बुनियाद पर सत्ता स्थापित करने का नाम है। भारत का बहुसंख्यक वर्ग अगर इसे स्वीकार कर रहा है तो फिर उसे किसी बड़ी तबाही के लिये तैयार रहना चाहिये क्योंकि यह समय ‘‘फासिज़्म’’ का नहीं है और ‘‘फासिज़्म’’ के जनक ‘‘हिटलर’’ का जो परिणाम हुआ था वह इतिहास के पन्नों में देखा जा सकता है।
हाल ही में मुज़फ्फरनगर में साम्प्रदायिक दंगें हुए हैं। साम्प्रदायिक दंगों में अक्सर दोनों ही समुदायों का कुछ न कुछ क़सूर होता है। मुजफ्फरनगर के इस दंगे को भड़काने में एक फर्ज़ी विडियो क्लिप ने आग में घी का काम किया था। इसमें अल्पसंख्यक वर्ग के द्वारा बहुसंख्यक वर्ग के लोगों को मारते हुए दिखाया गया था। यह एक फर्ज़ी विडियो क्लिप था जिसके बारे में पुलिस महानिदेशक तक को टी0 वी0, रेडियो, अख़बारों के माध्यम से यह सफाई देनी पड़ी कि उस विड़ियो की जाँच करा ली गयी है। वह पूरी तरह फर्ज़ी है और पब्लिक उस पर ध्यान न दे। इस फर्ज़ी विड़ियो क्लिप को कथित तौर पर बहुसंख्यक वर्ग की राजनीति करने वाली राजनीतिक पार्टी के एक विधायक ने इंटरनेट पर अपलोड़ किया था। जरा सोचंे! जिस देश के विधि विधाता इस प्रकार के कार्य करने लगे हों तो उस देश में राजधर्म की स्थापना होगी या जंगल राज की? फिर उस समाज के बारे में आपका क्या ख्याल है जो ऐसे घृणित कार्य करने वाले राजनेताओं का भव्य स्वागत करें। ज्ञात हो कि उक्त वर्णित विधायक जी का ‘‘श्री नरेन्द्र मोदी’’ की अगारा रैली में स्वागत किया गया है। अगर आप इसे राक्षसी प्रवृति नहीं समझते हैं तो फिर मेरी राय में आपको अपने दिमाग का इलाज कराने के बारे में विचार करना चाहिये। अगर भारत के बहुसंख्यक समाज ने इस प्रवृति को स्वीकार कर लिया है और वह देश की सत्ता उन हाथों में देने जा रहा है जो देश में उक्त प्रकार की राजनीति करेंगे तो समय की प्रतीक्षा की जाये। प्रकृति ऐसी मानसिकता का स्वयं इलाज कर देती है। ऐसा ही समय का इतिहास रहा है।

मोदी और हिटलर
मोदी की जो लोकप्रियता बनी है वह हिटलर के सहयोगी गोबल्स के उस फार्मूले पर आधारित है जिसमें उसने कहा था कि झूठ को अनेक लोग अनेक बार बहुतायत से बोलें तो वह सच की तरह दिखने लगेगा।
वास्तव में मोदी जैसे लोग बदनाम-ए-ज़माना हिटलर और मसूलीनी से अत्याधिक प्रभावित हैं। ‘‘राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ’’ के भूतपूर्व सर संघचालक डा. गोलवालकर ने अपनी किताब में हिटलर की बढ़ चढ़कर प्रशंसा की है और आर एस एस के संस्थापक डा0 हेडगीवार के गुरू डा0 बी एस मुंजे भी हिटलर और मसूलीनो के फासिज़्म के फलसफे से प्रभावित थे। डा0 मुंजे अपनी यूरोप यात्रा के दौरान इटली जाकर मसूलीनी से मिले थे और कई दिनों तक उनके मेहमान रहकर उन्होनें मसूलीनी की फौज के केन्द्रों को देखा था। डा0 मुंजे ने अपनी डायरी में इस यात्रा का विस्तार से वर्णन करते हुए एक दर्जन पृष्ठों में मसूलीनी की प्रशंसा की है।
‘‘हिटलर’’ और ‘‘ मसूलीनी’’ आज के हिन्दू क़ौम परस्तों के आदर्श हैं। जैसे यह क़ौम परस्त यहाँ की अल्पसंख्यक कम्युनिटी मुसलमानों को निशाना बनाकर राजनीति चमकाना चाहते हैं इसी प्रकार ‘‘हिटलर’’ ने ‘‘जर्मनी’’ में अल्पसंख्यक ‘‘यहूदियों’’ को निशाना बनाकर और बहुसंख्यक ईसाईयों को उनके विरूद्ध भड़काकर सत्ता हथियाई थी। हिटलर ने भी अपने इस कृत्य को ‘‘नेशनलिज़्म’’ का नाम दिया था जैसे आज के हिन्दूवादी ‘‘राष्ट्रवाद’’ की बात करते हैं। जैसे जर्मनी में हिटलर यहूदियों के लिये भय का पर्याय था ऐसे ही भारत में मोदी मुसलमानों के लिये भय और नफरत का पर्याय हैं परन्तु एक वर्ग के लिये वह ऐसे राजनीतिक हीरों हैं जिन्हें यह वर्ग देश के सर्वोच्च पद पर देखना चाहता है। इतिहास और भूगोल तक का सही ज्ञान न रखने वाला कमजोर आई0 क्यू0 का ऐसा व्यक्ति1 जो अपनी पार्टी में दूसरी पंक्ति का नेता था वह केवल इस कारण एक वर्ग के हृदय की धड़कनों में बस गया है क्योंकि वह दूसरे वर्ग के लिये भय का प्रतीक है। यह भी शायद उसी सिद्धांत पर आधारित है जो गोधरा कांड के बाद भड़के गुजरात दंगों पर श्री मोदी ने प्रस्तुत किया था कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। अगर भारत के भाग्य विधाता इसी सिद्धंात के दृष्टिगत देश में होने वाले साम्प्रदायिक दंगों और आतंकवादी घटनाओं को नज़र अंदाज़ करते रहे तो फिर श्रंखला बहुत दूर तक जायेगी। अगर श्री मोदी जी के सिद्धांतानुसार गोधरा के बाद की घटना गोधरा कांड की प्रतिक्रिया थी तो देश की कुछ तफतीशी ऐजेंसियों के इस कथन को भी स्वीकार कर लेना चाहिये कि मार्च 1993 के बम्बई बम ब्लास्ट 6 दिसम्बर 1992 की अयोध्या घटना की प्रतिक्रिया थी। इस प्रकार तो भारतीय विमान अपहरण केस से लेकर ‘‘अक्षरधाम मन्दिर’’ पर हमले और ‘‘बम्बई बम कांड’’ तक कितनी ही क्रियाओं की प्रतिक्रियाएँ दिखाई पड़ेंगी। अगर नफरत की ऐसी ही आँधी चलती रही तो फिर कोई भी समुदाय चैन की नींद नही सो पायेगा, क्या ऐसे सिद्धांत वादियों के हाथों में सत्ता सौंप कर बहुसंख्यक वर्ग पूरे देश को बदअमनी के अंधेरे में धकेलना चाहता है। बेहतर हो कि यह क्रियाएँ और प्रतिक्रियाएँ बन्द हों वरना यह एक ऐसी डायन है जो अपने और बैगानों में कोई अंतर नहीं करती।

मोदी और बुद्धिजीवी वर्ग
यह दुख की बात है कि हिन्दू समाज का हाई प्रोफाइल वर्ग जिसमें अपर क्लास, पढ़ा लिखा बुद्धिजीवी वर्ग शामिल हैं। मोदी का जादू उसके सर चढ़कर बोल रहा है। हमने जितने भी मोदी नवाज़ों से बात की है उन्होने केवल वही एक रटा रटाया ‘‘गुजरात विकास’’ के मॉडल का नारा लगाया जिसकी कोई परिभाषा उनके पास नहीं है। जहाँ तक मोदी की बात है तो दूसरी पंक्ति का यह लीडर केवल मुस्लिम दुश्मनी में ही सबसे ऊपर है और उसकी यही अदा अगर उसके भक्तों को भा रही है तो वह देश को कहाँ ले जाना चाहते हैं यह सोचने की बात है। स्पष्ट है कि मुस्लिम विरोध और खुली मुस्लिम दुश्मनी नरेन्द्र मोदी की एक महत्वपूर्ण विशेषता है जो उन्हे दूसरों से अलग करती है और यह हमारे देश के बहुसंख्यक समुदाय के एक विशेष वर्ग की पहली पसंद थी ही परन्तु देश के इस विशेष वर्ग में जिस प्रकार हिन्दू समाज का बुद्धिजीवी वर्ग सम्मिलित हुआ है और उसे भी मोदी में अपने सपनों का भारत दिखाई दे रहा है। तो यह चिन्ता का विषय है। मीडिया प्रजातंत्र का चैथा स्तम्भ है, जिसका कार्य निष्पक्षता से सच को सामने लाना और समाज को आइना दिखाने वाला होना चाहिये। परन्तु मीडिया कर्मियों ने जिस प्रकार मोदी का प्रचार किया है उसके कारण उनका मोदी प्रेम छुपाये नहीं छुपता। क्या यह वर्ग इस फरेब का शिकार हो गया है कि मोदी राजगद्दी पर बैठते ही, भारत की हर समस्या का तुरन्त समाधान कर देंगें।

मोदी सत्ता और मुसलमान
मुस्लिम समुदाय कभी नहीं चाहेगा कि मोदी जैसा व्यक्ति दिल्ली की गद्दी पर बैठे यद्यपि यह निर्णय बहुसंख्यक वर्ग को करना है, परन्तु मुस्लिम समाज मोदी जैसों से भयभीत कदापि नहीं है। कारण यह है कि मोदी या उनकी पार्टी उससे अधिक कुछ नहीं कर सकती जो गत आधी शाताब्दी से मुसलमानों के साथ होता आया है मौजूदा स्थिति यह है कि मुस्लिमों के नज़दीक बी जे पी और कांग्रेस एक सिक्के के ही दो रूख हैं। फर्क केवल यह है कि बीñ जेñ पीñ जो कुछ कहती आई है उसे कांग्रेस अपने सत्ताकाल में करती आई है। कांग्रेस का सैक्यूलरिज़्म केवल नाम का है, बकौल एक दानिश्वर-कांग्रेस कहती है कि उसके पास 24 कैरेट का सैक्यूलरिज़्म है जबकि वह 14 कैरेट का सैक्यूलरिज़्म बेचती है। इसी प्रकार बी जे पी का कहना है कि उसके पास 24 कैरेट का हिन्दुत्व है जबकि वह 14 कैरेट से ऊपर का हिन्दुत्व नहीं बेच सकती और 14 कैरेट का सैक्युलरिज़्म और 14 कैरेट का हिन्दुत्व दोनों का स्तर एक है ! कांग्रेस ने अपने सत्ताकाल में जितना हिन्दुत्व ला दिया है उससे अधिक लाना संभव नहीं है। आज़ादी के बाद देश की सत्ता कांग्रेस पार्टी के हाथ आई और उसकी छत्रछाया में भारतवर्ष एक धर्म निर्पेक्ष गणराज्य घोषित किया गया। आज भी यह देश संविधान के अनुसार एक सैक्यूलर देश है। परन्तु क्या धरातल पर भी ऐसा ही है? जिस देश की पार्लियामेंट के आरम्भ और अंत में ‘‘वन्देमात्रम्’’ की धुन बजे, हर प्रकार के सरकारी भवन का शिलान्यास ‘‘भूमि पूजन’’ से हो और शिक्षण संस्थानों में किसी भी प्रतियोगिता का आरम्भ ‘‘सरस्वती वन्दना’’ से किया जायें, जहाँ पर ‘‘इसरो’’ जैसा ‘‘अंतरिक्ष विज्ञान केन्द्र’’ अपने अंतरिक्ष मिशन से पहले ‘‘तिरूपति’’ के बाला जी का आशीर्वाद लेना जरूरी समझता हो और अंतरिक्ष में सेटेलाइट भेजने से पहले उसका एक छोटा सा मॉडल ‘‘त्रोमाला मन्दिर’’ में ‘‘भगवान बालाजी’’ के चर्णो मे रखता हो, अगर यह सब होते हुए भी कोई देश ‘‘धर्म निरपेक्ष’’ रहता है तो फिर कोई बताए कि धर्म पक्षधर किसे कहेंगें?
जब भी श्री नरेन्द्र मोदी का जिक्र होता है तो 2002 के गुजरात दंगों का चित्र मस्तिष्क में उभर आता है। यह बीñ जेñ पीñ या मोदी जी के हिस्से का कार्य था जो उन्होने अपने कार्यकाल मे किया जहाँ तक कांग्रेस की बात है तो उसके दामन पर ‘‘भागलपुर’’,‘‘जबलपुर’’,‘‘जमशेदपुर’’ ‘‘नीली’’, बम्बई, भैवन्डी, मुर्शिदाबाद, मुरादाबाद, ‘मेरठ और मलयाना जैसे न जाने कितने गुजरात के नक्शे मौजूद हैं केवल यही तो अन्तर है कि एक सैक्युलरिज़्म के नाम पर यह सब कुछ करता है और दूसरा हिन्दुत्व के नाम पर।

मोदी भक्त और मुसलमान
बहुसंख्यक समुदाय का वह वर्ग जो मोदी का बेपनाह भक्त है वह भारतीय मुसलमानों को सत्ता से दूर देश के संसाधनों से वंचित देखना चाहता है उसका प्रयास रहता है कि मुसलमान दूसरे दर्जे का ‘ाहरी बनकर रहें और दबाव में जीवन व्यतीत करें, स्वंय बीñ जेñ पीñ के एक दिग्गज नेता ने ‘‘मिस्टर जिन्ना’’ पर लिखी अपनी एक पुस्तक में इस ओर इशारा किया है कि बँटवारे के बाद देश में रह जाने वाले मुसलमानों के साथ अछूतों जैसा सुलूक किया गया। यह वर्ग जो कुछ चाहता है कांग्रेस ने तो उसे करके दिखाया है। आजादी के समय सरकारी नौकरियों में जहाँ मुसलमान तीस प्रतिशत थे वहाँ आज तीन प्रतिशत से भी कम हैं। जहाँ तक मुसलमानों को दबाव में रखने की बात है उसको एक उदाहरण से समझा जा सकता है। गत दिनों देश भर में कुछ अप्रिय घटनाएँ होती रही हैं कहीं बम फट गया, कहीं किसी धर्म स्थल पर हमला हो गया, कहीं पुलिस अधिकारियों के नाम पुलिस स्टेशन या रेलवे स्टेशन को बम से उडाने की धमकी भरा पत्र या ईमेल आ गया, ऐसी घटनाओं को देश के विधि विधाताओं से लेकर मीडिया तक ने कई स्थानों में बाँटा है।
इस प्रकार की घटनाएँ अगर आम शाहरों में होती हैं और उनको हिन्दू समाज या संगठन से जुडे़ किसी व्यक्ति ने अंजाम दिया है तो समझिये कि वह एक सामान्य घटना है और उसको अंजाम देने वाला व्यक्ति मानसिक रूप से ठीक नहीं था। इस कारण यह घटना तवज्जह देने लायक़ भी नहीं है। अतः ऐसे मामले को या तो पुलिस दबा देती है और अगर मुक़दमा दर्ज भी हो गया तो किसी को कुछ पता नहीं चलता कि फिर इस मामले में क्या हुआ? और अगर इस प्रकार की घटना में किसी मुसलमान व्यक्ति का नाम आ जाये तो मीडिया कर्मियों से पुलिस विभाग तक की सक्रियता देखते ही बनती है। सबसे पहले मीडिया ट्रायल शुरू होता है और मीडिया को विशेष सूत्रों से ज्ञात होता है कि यह कार्य करने वाला अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवादी था जिसके तार कई इन्टरनेशनल दहशतगर्द संगठनों से जुडे थे, और फिर अन्डर ग्राउन्ड आतंकवादी संगठनों के ऐसे ऐसे नामों से उसे जोड दिया जाता है कि वह व्यक्ति ही क्या उसके दूर-दूर के रिश्तेदार भी काँपने लगते हैं और वह पुलिस विभाग और देश की वह तफतीशी ऐजेंसियाँ जो बहुचर्चित आरूशी हत्या कांड़ में केवल चार व्यक्तियों के एक घर में होने वाले कत्ल के कातिल की चार वर्षों तक जाँच पड़ताल के बाद भी अंधेरे में भटकती रही और अन्त में अपनी ओर से उसने न्यायालय के समक्ष क्लॉजिंग रिपोर्ट पेश की। हमारी वही सक्रिय पुलिस उक्त प्रकार की किसी घटना में पकड़े गये किसी मुसलमान व्यक्ति को छूकर यह बता देती है कि उसके तार किस किस देश से जुडे थे। वह कितनी दुर्घटनाओं का मास्टर माइंड है और किस किस लीडर को बतौर-ए-खास बीñ जेñ पीñ के लीडरों को मारने की वह योजना बना रहा था।
हमारी पुलिस की सक्रियता से एक बात यह भी सामने आती है कि राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के यह आतंकवादी कमान्ड़र इतने बेवकूफ भी होते हैं कि पकड़े जाने से पहले एक पर्चा लिखकर अपनी जेब में रख लेते हैं जिसमें उनकी सारी प्लानिंग होती है और वह पर्चा उर्दू में होता है। तात्पर्य यह है कि ऐसी घटनाओं के पीछे अगर मुस्लिम समुदाय से जुड़े तत्व पाये जायें तो उसका नाम उन्होने आतंकवाद रखा है और अगर उस घटना के पीछे मुस्लिमों के अतिरिक्त कोई और है तो फिर वह आतंकवाद नहीं कुछ और है। गोया कि इन्हें केवल उसी घटना से आंतक और भय महसूस होता हे जिसे कोई मुसलमान अंजाम दे, बाक़ी लोग तो घर के सदस्य हैं वह चाहे कितनी भी बड़ी घटना कर दें उससे आतंक नही फैलता। अतः वह आतंकवाद नहीं कुछ और है।
नक्सलियों द्वारा की जाने वाली घटनाओं का उक्त प्रकार की घटनाओं से तुल्नात्मक अध्ययन कीजिये। सत्य सामने आ जायेगा। नक्सली बम ब्लास्ट करें, बारूदी सुरंग बिछाकर धमाका कर दें, दो-दो दर्जन पुलिस कर्मियों को मौत के घाट उतार दें। एक सिपाही को मारकर उसका पेट चाक करके उसमें बम रख दें, यह सब आतंकवाद नहीं है क्योंकि इसका जो नाम रखा गया है उसे ‘नक्सलवाद’ कहते हैं।

भगवा आतंकवाद
एक दौर था जब बी जे पी वाले कहा करते थे कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं परन्तु हर आतंकवादी मुसलमान है। भला हो समय का, कि उसने एक ईमानदार अफसर सामने ला दिया जिसने इस मिथ को तोड़ा, उस अफसर को ‘‘हेमंत करकरे’’ के नाम से जाना जाता है जिसने पहली बार देश को ‘‘भगवा आतंकवाद’’ से परिचित कराया। ‘‘हेमंत करकरे’’ और उनकी टीम द्वारा उजागर किये गये भगवा आतंकवाद के बाद दो प्रकार के आतंकवादी चेहरे सामने आये। इनमें से एक को आप चाहें तो ‘‘मुस्लिम आतंकवाद’’ और दूसरे को ‘‘हिन्दू आतंकवाद’’ कह सकते हैं। आतंकवाद के इन दोनों समूहों  में हमको एक बड़ा स्पष्ट अंतर दिखाई पड़ता है अर्थात जो मुसलमान इस प्रकार की घटनाओं को अंजाम देने के इल्ज़ाम में पकड़े गये वह अक्सर सामान्य तरह के आम लोग थे जबकि दूसरी ओर ऐसे ‘‘साधु’’ और ‘‘साधुवी’’ पकड़े गये जिनके पीछे लाखों की भीड़ थी। ऐसे ‘‘स्वामी’’ और ‘‘महात्मा’’ पकड़े गये जो तथाकथित ‘‘शंकर आचार्य’’ के पद को छूने के दावेदार थे और ग़ैर जानिबदारी के लिये मशहूर फौज के बडे़-बडे़ पदाधिकारी ‘‘लेफिटनेंट कर्नल’’ और ‘‘मेजर’’ जैसे अफसर ‘ाामिल थे। यही नहीं बल्कि स्वर्गीय ‘‘हेमन्त करकरे’’, ‘‘अशोक कामटे’’ और ‘विजय सालकर’ की विशेष टीम ने जो बम्बई ऐ टी ऐस का हिस्सा थी। हिन्दू क़ौम परस्त कही जाने वाली बड़ी बड़ी संस्थाओं के पदाधिकारियों के नाम उजागर किये थे जो अपनी छत्रछाया में आतंकवाद को पालने पोसने का कार्य कर रहे थे।

आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता
यहाँ पर स्वर्गीय हैमन्त करकरे एवं उनकी टीम को धन्यवाद दिये बिना नही रहा जा सकता जिन्होने आज़ाद भारत के इतिहास में पहली बार निष्पक्ष छानबीन करने का प्रयास किया और यह साबित कर दिया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। इसी के साथ उन्होने देश में बड़ी आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने वाले दो बड़े फौजी अफसर और तीन बड़े धर्म गुरूओं एक स्वंयभू ‘‘साधू’’ व एक ‘‘साधुवी’’ और एक तथाकथित ‘‘स्वामी’’ को गिरफ्तार किया और खुद को राष्ट्रवादी संस्था कहने वाले एक संगठन के बड़े पदाधिकारी की आतंकवादी घटनाओं में सक्रिय भूमिका निभाने वाले एक बड़े नेता का नाम उजागर किया था इसके साथ साथ उन्होने ऐलान किया था कि कुछ और बड़ी मछलियाँ पकड़ में आने वाली हैं, अभी यह चल ही रहा था कि बम्बई पर 26ध्11 का आतंकवादी हमला हो गया जिसमें दस आतंकवादियों ने पूरी मुम्बई को तीन दिन तक यरग़माल बनाये रखा और सारा देश सकते में आ गया। जाँच में यह बात सामने आई कि दस आतंकवादी पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से आये थे। बहुत से मुस्लिम विचारक यह ख्याल करते हैं कि यह घटना हैमन्त करकरे जैसे इंसाफ पसन्द अफसर और उनकी टीम को मरवाने के लिये उन तत्वों द्वारा अंजाम दिलाई गई जो भगवा आतंकी चेहरे के उजागर होने से दुखी थे। उन्होनंे ही इस कार्य के लिये पड़ोसी देश के आतंकी कारखानों से दस आतंकवादी आयात कर इस दुर्घटना को अंजाम दिलवाया था। शायद पाठकों को याद हो कि यह घटना तीन दिनों तक चलती रही थी परन्तु पहले दिन सर्वप्रथम जो सूचना प्राप्त हुई थी उसमें ‘‘हैमन्त करकरे’’ और उनकी पूरी टीम के मारे जाने की खबर थी, जैसा कि आतंकवादी केवल इसी कार्य के लिये आऐ थे।
यह भी शायद आपको याद हो कि उस वक्त के एक मुस्लिम सांसद ‘‘अब्दुर्रहमान अनतुले’’ ने इस बात पर प्रश्न चिह्न लगाते हुए कि जहाँ करकरे और उनके साथी मारे गये हैं। उस विरोधी दिशा में वह कैसे पहुँचे? इसकी जाँच कराई जाए। जब पार्लीमेन्ट मे यह बात उठाई गई तो सबने एक आवाज़ होकर उनकी आवाज़ को दबा दिया था जबकि वह केवल निष्पक्ष जाँच की माँग कर रहे थे जिससे केवल सत्य ही सामने आता।
 शायद यह भी आपको याद हो कि ‘‘हैमन्त करकरे’’ की मौत के बाद उनकी पत्नी से मिलने श्री ‘‘नरेन्द्र मोदी’’ जाना चाहते थे और उन्होनें एक करोड रूपये देने की भी पेशकश की थी लेकिन उनकी पत्नी ने न तो उनसे मिलने की अनुमति दी और न ही एक करोड़ रूपया स्वीकार किया। बहरहाल यह फर्ज़ शनास अफसर मारा गया तो स्थिति फिर वहीं पहुँच गयी और दोबारा से मुसलमानों को कटघड़े में खड़ा किया जाने लगा और यह सब कांग्रेस पार्टी की छत्रछाया में होता रहा।

श्री नरेन्द्र मोदी की पार्टी अगर सत्ता मे आती है तो इससे  अधिक और कर भी क्या सकती है? इसलिये हिन्दुस्तान का मुसलमान न तो बी जे पी से डरता है और न मोदी से डरता है। मगर हाँ वह बी जे पी की ‘‘जंगलराज’’ और ‘‘फासीवाद’’ सोच (जिसका ऊपर ज़िक्र हुआ) के कारण उसे नापसन्द करता है और मोदी को एक ज़ालिम फॉसिस्ट सत्ताधारी समझते हुए उससे कड़ी नफरत करता है। अगर बहुसंख्यक समुदाय का एक विशेष वर्ग मोदी को उनके मुस्लिम विरोध की कट्टरता के कारण ही सर आँखों पर बिठा रहा है तो समझ लीजिए कि दो बड़े समुदायों के बीच नफरत की एक बड़ी खाई खोदी जा रही है। जो देश और समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।

Monday, December 23, 2013

जंगल राज

  जंगल राज 
अगर आप के गली मोहल्ले में दो वयक्ति एक ही स्थान  पर अपना अपना दावा करने लगें और दोनों उसे अपना कहें तो आप की नज़र में इसका हल क्या है ,शायद आप कहेंगें कि उन्हें अपना दावा न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर देना चाहिए ,ताकि वह उनके मसले को हल करे  परन्तु अगर इसी बीच एक पक्ष उस पर मकान  का निर्माण करदे  और उस पर ,शोर्य का प्रतीक ,का बोर्ड लिख कर लगादे  तो इसे  क्या कहा जाएगा ,शायद आप कहें कि इसे ही जंगल राज कहा जाता है ,अच्छा तो बताएं ,कि क्या आप ने जंगल राज के बारे में सुना हे तो बताइये किसे कहते हें जंगल राज। यक़ीनान आप कहेंगे कि जंगल राज यह होता हे कि जिसकी लाठी उसकी  भेंस। मतलब जिसके पास ताक़त वह जो चाहे करे।  उस को न न्यायालय का कोई डर और न सरकार  का कोई भय।आप  इस की और अधिक पुष्टि चाहते हें तो आप को थोडा इतिहास का अधयन  करना होगा। मेरी मुराद है   कि आप 1992  का दौर याद कीजिये यह मसला अयोधिया  के विवादित ढांचे का हे जो अभी न्यायालय के समक्ष विचाराधीन था और सरकार ने भी उसे सुरक्षित रखने का हलफनामा जमा किया था ,लेकिन ताक़त के बल पर एक समुदाय ने उसे तोड़ दिया और उसने इस परकार सरकार   और  न्यायालय दोनों  को ठेंगा दिखा दिया  ,फिर इसी दिन यह लोग शोर्य दिवस भी मानते हैं ,इसे ही तो कहते हें  ,,जिसकी लाठी उसकी........................?

Wednesday, June 19, 2013

aslam qasmi reply pt. mahendrapal arya samaji pandit


Hindi Book "महेन्द्रपाल आर्य बनाम कथित महबूब अली"  के द्वारा उठाई गयी आपत्तियों की विश्लेषणात्मक समीक्षा

लेखकः
डा. मुहम्मद असलम कासमी
                   Ph.D.

फोनः 9837788115
E-mail:   dr_aslam.qasmi@yahoo.com

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aslamqasmi.blogspot.in

पुस्तकः हकप्रकाश बजवाब सत्यार्थ प्रकाश
एवं सत्यार्थ प्रकाश समीक्षा की समीक्षा पढने के लिए देखें
satishchandgupta.blogspot.in

प्रकाशित:
सनातन सन्देश संगम
मिल्लत उर्दू एकेडमी, मौहल्ला सोत, रुड़की, उत्तराखंड

HIndi PDF Book Links महेन्‍द्रपाल आर्य बनाम कथित महबूब अली के द्वारा उठाई गयी आपत्तियों की विश्‍लेष्‍णात्‍मक समीक्षा 
http://www.mediafire.com/view/q9waa7j9278ccw7/aslam_qasmi_rep_Mahendra_pal_Arya.pdf
&
http://www.scribd.com/doc/148479080/Aslam-Qasmi-Reply-Mahendra-Pal-Arya 

  दो शब्द 
आज़ादी के बाद भारतीय मुसलमानों को जहाँ कई प्रकार की समस्याओं का सामना है वहीं एक यह भी है कि एक विशेष मानसिकता के लोग इस्लाम और मुस्लमानों पर झूठे और बेतुके इल्जामात लगाकर उन्हें मानसिक उलझनों का शिकार रखना चाहते हैं। जिहाद सम्बन्धित कुरआन-ए-करीम की कुछ आयतें इनके खास निशाने पर रही हैं। इस तरह के आरोपों के कई प्रकार से उत्तर दिये जा चुके हैं स्वयं एक स्वामी ‘‘लक्षमी शंकर आचार्य’’ जिन्होंने कुरआन की ऐसी ही आयतों पर आधारित एक पुस्तक लिखी थी परन्तु जब उनके सामने सच्चाई पेश की गयी तो उन्हें अपने किये पर खेद हुआ, और उन्होंने अपनी पुस्तक से दस्त बरदार होते हुए स्वयं उक्त आपत्तियों के उत्तर पर आधारित एक पुस्तक ‘‘इस्लाम आतंक या आदर्श’’ के नाम से लिखी जिसमें उन्होंने अपनी गलती को स्वीकार करते हुए अल्लाह और उसके रसूल से और मुसलमानों से क्षमा याचना की है, और अपने ही द्वारा उठाये गये प्रश्नों के उत्तर स्वयं प्रस्तुत किये हैं। परन्तु अब शत्रु मानसिकता एक नया मोहरा लेकर आयी है। इस सरसरी लेख में उस नये मोहरे की वास्तविकता पर विचार किया गया है। अगर इस लेख में कहीं कोई बात वास्तविकता से हट कर दिखाई दे तो कृपया मुझे सूचित करें। मैं उसे वापस लेने को तैयार हूं ।
- डा. मुहम्मद असलम कासमी
        मोबाईल फोन: 9837788115
 मिल्लत उर्दू एकेडमी, मौहल्ला सोत, रुड़की

पंडित महेन्द्रपाल आर्य का लिखा आपत्ति पत्र ‘‘कुरआन में गैर मुस्लिमों को जीने का हक नहीं’’ के शीर्षक का एक पत्रक मानवाधिकार आयोग के एक मेम्बर द्वारा प्राप्त हुआ, उन्होंने बताया कि यह पत्रक आयोग को डाक द्वारा मिला था। उस में जो आपत्ति जताई गई है वह कोई नई बात नहीं है। इस तरह की आपत्तियां इन्टरनेट पर काफी दिनों से मौजूद हैं जिनका भिन्न-भिन्न स्तरों से जवाब भी दिया जा चुका है। यों भी यह वही बातें हैं जो गत सैकडों वर्षों से इस्लाम विरोधी जताते रहे हैं और उस के अनेक बार अनेक लोगों की ओर से संतोषजनक और स्पष्ट उत्तर दिये जा चुके हैं। मुझे यह पत्र पहली बार प्राप्त हुआ है मैं भी पंडित महेन्द्र पाल के समक्ष उत्तर प्रस्तुत करुंगा, परन्तु एक बात का विश्लेषण आवश्यक है। वह यह कि महेन्द्रपाल की ओर से यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि वह पूर्व में मौलवी महबूब अली थे, केवल मौलवी ही नहीं अपितु हाफिज-ए-कुरआन भी थे। ज्ञात हो कि मौलवी वह होता है जिसे कुरआन, हदीस, फिका, तफसीर, अकाइद, इल्म-ए-कलाम, मन्तिक, फलसफा आदि का पूर्ण ज्ञान हो। यह सब ज्ञान अरबी भाषा के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। अतः एक मौलवी अरबी भाषा का पूर्ण ज्ञानी होता है। यह कोर्स करीब पन्द्रह वर्षो का है।
दूसरी डिग्री महेन्द्रपाल (महबूब अली) के पास उनके दावे के अनुसार हाफिज की भी थी। हाफिज़ वह होता है जिसे पूरा कुरआन मुंह जुबानी कंठस्थ हो, और वह जहाँ से चाहे खडे-खडे़ कुरआन पढ़ कर सुना सके।
मुझे असल इसी विषय पर बात करनी है मगर पहले उनकी आपत्तियों पर चर्चा करते हैं क्योंकि महेन्द्र पाल जी के मशहूर प्रश्नों जैसे के भिन्न-भिन्न विद्वानों के द्वारा कई-कई बार उत्तर दिये जा चुके हैं। इसलिये हम यहाँ पर सूक्ष्म शब्दों में उन के प्रश्न का उत्तर देते हुए या यों कहा जाए कि उनकी गलत फहमी को दूर करते हुए दूसरे विषय पर चर्चा करेंगे।
पहले उनकी गलत फहमी का समाधान
उन्हें गलत फहमी है कि कुरआन में गैर मुस्लिमों को जीने का हक नहीं और इसी शीर्षक से उनका उक्त वर्णित पत्रक भी है। हमने इस पुस्तक के अंत में उनके पत्रक के शीर्षक वाले पृष्ठ को इस पुस्तक के पृष्ठ न. 45 पर दिया है। इस पत्रक में वह सबूत के तौर पर कुरआन की कुछ आयतें प्रस्तुत करते हैं। जिन आयतों पर उन को एतराज है हम उनको आगे नकल करेंगे परन्तु इस से पहले महेन्द्रपाल जी से इन आयतों  के सम्बन्ध में कहना चाहेंगे के महाशय! आप तो (अपने दावे के अनुसार) सनद याफ्ता मौलवी हैं तो यकीनन यह तो आप जानते ही होगे कि कुरआन की हर आयत का एक बैकग्राउंड या पस-ए-मंजर होता है जिसे कुरआन की इस्तिलाह में शान-ए-नज़ूल कहते हैं। जिसे जाने और समझे बिना कुरआन पर प्रश्न चिन्ह लगाना स्वंय महेन्द्र जी पर इस बात का प्रश्न खड़ा करता है कि क्या उन्हें यह मान लिया जाए। कि वह भूतकाल में महबूब अली थे या इस से भी बढ़कर मौलवी महबूब अली थे।
कुरआन का अवतरण लगभग 23 वर्षो में परिस्थिति के अनुसार हुआ वे आयतें जिन पर महेन्द्र जी को ऐतराज है वे नबुव्वत मिलने के दस वर्ष बाद जब आप मक्का छोड़ कर मदीना चले गये उनका नुज़ूल तब आरम्भ हुआ और इस प्रकार की आयतें जो करीब डेढ़ दर्जन हैं वे लगभग 15 वर्षो की लम्बी अवधि में समय अनुसार नाज़िल हुईं। इसलिये कुरआन की एक एक आयत को समझने के लिये हजरत मुहम्मद सल्लललाहु अलैहिवसल्लम की जीवनी को जानना  आवश्यक है। श्री महेन्द्रपाल जी अगर अपने दावे के अनुसार पहले मौलवी महबूब अली थे तो हम उन से यह कैसे आशा कर सकते है कि वह मुहम्मद सल्लललाहु अलैहिवसल्लम की जीवनी या कुरआनी आयतों के शान-ए-नुजूल से परिचित नहीं होंगे। परन्तु जो व्यक्ति हजरत मुहम्मद सल्लललाहु अलैहिवसल्लम की जीवनी व कुरआनी आयतों के शान-ए-नुजूल से परिचित होते हुये कुरआन की उक्त आयतों पर प्रश्न खड़ा करें। हम उसे अपने दिमाग का इलाज कराने की सलाह देंगे। यह केवल हमारा निर्णय नहीं। हम इसे पाठकों की अदालत में रखते  हैं। वे स्वयं समझें और निर्णय लें और महेन्द्र जी के हाल पर विलाप करें ।
मुहम्मद सल्लललाहु अलैहि वसल्लम की जीवनी एक खुली किताब की मानिन्द है केवल मुसलमान ही नहीं अपितु कोई पढ़ा लिखा गैर मुस्लिम भी शायद ऐसा न होगा जो इस बात से परिचित न हो। कि मुहम्मद साहब मक्का नामक शहर में पैदा हुए थे और उन्होंने वहाँ पर इस्लाम धर्म का प्रचार शुरु किया तो मक्के वाले उनके शत्रु बन गये और उनको और उनके अनुयाइयों को यातनाएं देने लगे। यहां तक कि तीन वर्षों तक शत्रुपक्ष ने मुहम्मद सल्लललाहु अलैहि वसल्लम व उनके अनुयाइयों का पूर्ण रुप से बाइकाट भी किये रखा। जब यह यातनाएं बर्दाश्त से बाहर हो गईं तो मुहम्मद साहब ने आपने अनुयाइयों को मक्का छोड़ कर कहीं और चले जाने की सलाह दी और जब एक दिन मक्के वालों ने यह तय किया कि आज रात को वे सब एक साथ मिलकर (नऊजु बिल्लाह) मुहम्मद साहब का वध कर देंगे तो उन्‍हों ने स्वयं भी अपना शहर छोड़ दिया और जब वह अपने एक साथी के साथ रात के समय घर से निकले और शहर से बाहर जाकर जब उन्हांेने मदीने का रुख किया तो पीछे मुड़कर देखा और यह शब्द कहे, जो इतिहास में सुरक्षित हैं।
‘‘मेरे प्यारे वतन मक्के नगर! मुझे तुझ से बहुत प्यार है अगर तेरे वासी मुझे यहां रहने देते तो मैं तुझे कभी न छोड़ता।’’
और फिर आप मदीने की ओर चल निकले। यह बात नोट करने लायक है कि आप मक्का नगर छोड़ कर किसी करीबी स्थान पर नहीं रुके अपितु मक्के से करीब पांच सौ कि.मी. दूर मदीना शहर में जा कर निवास किया। मक्के वाले जो मुहम्मद साहब के घर का घेराव कर चुके थे जब उन्होंने देखा कि वे बच निकले हैं और उन के तमाम साथी मदीना पहुँच कर आराम से रहने लगे हैं तो उन्‍हों ने वहाँ भी मुसलमानों को तंग करने का प्रयास किया। अतः पहले उन्होंने मदीने वालों को आपके विरुद्ध उकसाना चाहा। इसमें  कामयाब न हुए तो स्वयं लाव-लश्कर लेकर मदीने पर चढ़ाई के लिए निकल पड़े। मक्के वालों की मदीने पर पहली चढ़ाई में मक्के वालों की ओर से करीब सात सौ व्यक्तियों ने भाग लिया जबकि मदीने में मुसलमानों की कुल संख्या उन से लगभग आधी थी। यहां से उन आयतों का अवतरण आरम्भ हुआ जिनसे महेन्द्र जी के दिल की धड़कनें बढ़ गयीं।
यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि मक्के वालों ने मदीने पर तीन बड़े आक्रमण किये। पहला हिजरत से दूसरे वर्ष, दूसरा हिजरत से तीसरे वर्ष और तीसरा हिजरत के चौथे वर्ष, अतः कुरआन की निम्न आयतें जिन पर महेन्द्र जी ने ऐतराज किया है, वे भी स्थिति के अनुसार समय-समय पर नाज़िल होती रही हैं। यहाँ तक कि कुछ आयतें हिजरत से आठ-दस वर्ष बाद फतह मक्का के समय भी नाज़िल हुईं।
अब कुरआन की वे आयतें देखें -
1.  जिन लोगों को मुकाबले के लिये मजबूर किया जा रहा है और उन पर जुल्म ढ़ाये जा रहे हैं अब उन्‍हें भी मुकाबले की इजाजत दी जाती है क्योंकि वह मजलूम हैं। यह इजाजत उन के लिये है जिन्‍हें  नाहक उनके घरों से निकाला गया। सिर्फ इस लिये कि वे कहते थे कि हमारा परवरदिगार अल्लाह है (सूरह हज 49)
2.  और उन से लड़ो जहां भी वे मिलें और उन्हें निकाल बाहर करो वहां से जहां से उन्होंने तुम्हें निकाला था औैर फितना बरपा करना कत्ल से भी बढ़ कर है और तुम उन से मस्जिद हराम के पास मत लड़ना जब तक वह तुम से न लड़ें।(सूरह बकर 119)
3. फिर अगर वह लोग बाज़ रहें तो बेशक अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है (सूरह बकर 192)
4.  क्या तुम नहीं लड़ोगे उनसे जिन्होंने सन्धि को तोड़ा और मुहम्मद साहब को निकाल बाहर करने के लिए तत्पर रहे, क्या तुम उन से डरते हो? अगर तुम इमान रखते हो तो ईश्वर इस बात का अधिक योग्य है कि तुम उस से डरो। लड़ो उन से ईश्वर तुम्हारे हाथों उन्हे दंड दिलवायेंगे उन्‍हें ज़लील करेंगे और तुम्हारी सहायता करेंगे- (सूरह तोबा, आयत 13, 14)
5.  हे नबी। इमान वालों को युद्ध करने के लिये आमादा करो यदि तुम में से बीस भी डटे रहने वाले होंगे तो वे 200 पर प्रभुत्व प्राप्त करेंगे, यदि सौ ऐसे होगें तो वे 4000 पर भारी रहेंगे (सूरह अनफाल, आयत 65)
 हम इन आयतों के हवाले से महेन्द्र जी से कहना चाहेंगे कि पंडित महाश्य ज़रा इन कुरआन की आयतों का अन्दाज़-ए-ब्यान तो देखिये -
1. और निकाल बाहर करो उन्हें वहां से जहां से उन्‍हों ने तुम्‍हें निकाला था, आप जानते है कि मक्के वालो ने मुहम्मद साहब और उन के साथियों को निकाला था, अतः ज़ाहिर है कि यह उसी के दृष्टिगत है तो महेन्द्रपाल जी आपको क्या परेशानी हुई?
2. लड़ो उन से जिन्‍हों ने सन्धि को तोड़ा है।
इस्लामी इतिहास का एक मामूली विद्यार्थी भी इस बात को जानता है कि सन सात हिजरी में मुहम्मद साहब और मक्के वालो के बीच एक सन्धी हुई थी जो मुसलमानो की ओर से बेहद दबकर की गई सन्धि थी। इसमें  सारी बातें , सारी शर्तें, मक्के वालों की मानी गई थी। शर्तें  भी एक तरफा थीं। विस्तार से ब्यान करने का मौका नहीं परन्तु एक उदाहरण देखिये-उसमें मक्के वालों ने शर्त रखी थी कि अगर हमारा कोई आदमी मुसलमान बन कर आपके पास आता है तो आप को लौटाना होगा, परन्तु अगर तुम्हारा आदमी हमारे पास आता है तो हम उसे नहीं लौटाएंगे - इस प्रकार की करीब एक दर्जन शर्तें मक्के वालों की मुहम्मद साहब ने स्वीकार की थी और इस के बदले अपनी केवल एक शर्त मनवायी थी वह क्या थी उसे भी देखिए।
मुहम्मद साहब ने मक्के वालों से केवल एक बात की गारंटी चाही थी। वह यह कि मक्के वाले मुसलमानों पर अगले दस सालों तक न तो कोई आक्रमण  करेंगे न किसी आक्रमण करने वाले का साथ देंगे।
लेकिन दुर्भाग्य से मक्के वालों ने इसका एक वर्ष तक भी निर्वहन नहीं किया। उक्त आयत में इसी सन्धी को तोड़ने का जिक्र है परन्तु महेन्द्र जी! आपने तो किसी सन्धी को नहीं तोड़ा है। फिर आपको क्यों चिंत्ता हो रही है?
जिस व्यक्ति के सामने कुरआन की आयतों के यह पसमंजर हों और फिर भी वह किसी आयत पर आपत्ति जताये, ऐसे व्यक्ति के बारे मे यही कहा जा सकता है कि वह या तो एक समुदाए के लोगों को समुदाय विशेष के विरुद्ध भड़काकर अपने स्वार्थ की दुकान चलाना चाहता है और या उसका दिमागी तवाज़ुन बिगड़ चुका है और या फिर उसने कुरआनी आयत के पसमन्ज़र को जाने बगैर उसका सरसरी अध्ययन किया है, परन्तु महेन्द्र पाल तो मौलवी थे उनसे यह आशा कैसे करें। अतः स्पष्ट है कि पहली दो बातों में  से कोई एक उन पर लागू होती है।
आयत न. 2 और 3 को एक बार फिर पढ़िएः
यह आयतें महेन्द्र जी के पत्रक के पृष्ठ न. 5 पर अंकित की गयी हैं।
जब मुहम्मद साहब अपने हजारों साथियों के साथ हिजरत के दस्वें वर्ष मक्के में दाखिल हुये इस मौके पर कोई युद्ध नहीं हुआ ना ही मक्के वालों की ओर से कोई खास विरोध की स्थिति सामने आयी परन्तु आप उन आयतों की शब्दावली देखिये जो इस मौके पर नाज़िल हुयीं।
उन्‍हें वहाँ से निकाल दो जहाँ से उन्होंने तुम्‍हें निकाला था -
और तुम उन से मस्जिद-ए-हराम के पास मत लड़ना -
इस में मक्के वालों के लिये एक पैग़ाम था कि अगर वे युद्ध न चाहें तो मस्जिद-ए-हराम में दाखिल हो जायें।
यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि यहाँ जिस मस्जिद में और उसके आस-पास लड़ने को मना किया जा रहा है वह उस समय मक्के वालों के ही कबज़े में थी ।
अब इस मोके पर मुहम्मद साहब ने जो घोषनाएं की वह भी देखें: -
आप ने ऐलान कराया जो मस्जिद के पास चला जाये, उसे कुछ न कहा जाये जो अपने घर के दरवाजे बन्द कर ले उसे न छेड़ा जाये और जो अबूसुफयान के घर में घुस जाये उसे कुछ न कहा जाये।
अबू सूफयान कौन थे?
मुहम्मद साहब व उनके साथियों से मक्के वालों के जितने भी युद्ध हुये हैं उन में से एक को छोड़ बाकी सभी की कमान अबू सुफयान के हाथ में रही है। क्या संसार का इतिहास कोई एक ऐसा उदाहरण पेश कर सकता है कि जिस में शत्रु फौज के कमान्डर को यह सम्मान दिया गया हो कि अगर कोई उस के घर में घुस जाये तो उस की जान बच जायेगी।
यहाँ मैं एक विशेष बात कहना चाहूंगा ।
अकसर कहा जाता है कि मुसलमान बड़ा जज़बाती होता है और वह अपने धर्म या धर्म प्रवर्तक के बारे में कुछ भी सुनने की सहनशीलता नहीं रखता ।
हाँ यह बात सही है परन्तु उसका कारण स्वभाविक है। जिसका धर्म प्रवर्तक ऐसा हो जैसा ऊपर बताया गया फिर भी कोई उस पर यह इलजा़म लगाये की उनके यहाँ गैर मुस्लिमों को जीने का हक़ नहीं तो अनुयाइयों का जज़बाती होना स्वाभाविक होता है।
श्री महेन्द्र जी ने सूरह अनफाल की आयत न. 65 का वर्णन किया है, जिसमें कहा गया है कि लड़ो उन से तुम्हारे बीस उनके दो सौ पर भारी रहेंगे और तुम्हारे सौ उनके चार हजार पर प्रभुत्व प्राप्त करेंगे। कुरआन में जहाँ यह आयत है वहीं दो आयतों के अन्तर पर निम्न आयतें भी है।
और अगर शत्रु (युद्ध के बीच) सुलह/सन्धि की ओर झुके तो तुम भी सुलह कर लेना और ईश्वर पर भरोसा करना वह सब कुछ सुनता और जानता है। यहाँ तक कि अगर उनका (शत्रु पक्ष) इरादा धोखे का हो (तो भी परवाह न करना) तुम्हारे लिए ईश्वर काफी है। (सूरह अनफाल आयत न. 61-62)
एक दूसरे स्थान पर कुरआन में आदेश है कि
सुलह करना (बहरहाल लड़ाई झगडे़ से) बेहतर है।  सूरह निसा 128

इस परिपेक्ष में  महेन्द्र जी से पूछना चाहूंगा कि क्या इस्लाम और कुरआन पर उंगली उठाते हुए बिलकुल ही न सोचा? अरे भाई जो संविधान यहां तक सुलह पसन्द हो कि वह अपने अनुयाइयों को आदेश करे कि अगर सुलह के नाम पर शत्रु पक्ष धोखा देने का इरादा रखता हो तो भी तुम सुलह कर लेना क्योंकि शान्ति हर स्थिति में युद्ध से बेहतर है और जो संविधान धर्म के बारे में यह आदेश करे कि धर्म के सम्बन्ध में कोई जोर जबरदस्ती नहीं की जा सकती जो चाहे स्वीकार करे जो चाहे इन्कार करे। (सूरह बकर 256)
आप उसे यह इलजाम दें कि इस्लाम में गैर मुस्लिमों को जीने का हक़ नहीं? मैं तो आपके बारे में यही कह सकता हूं कि: शर्म आनी चाहिये नफरत के ऐसे पुजारियों को जो समाज के बीच नफरत का बीज बोकर उसके जहरीले फल शान्त समाज को खिलाना चाहते हैं।
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बहरहाल महेन्द्रपाल जी ने कुरआन को छोड़कर वैदिक धर्म को अपना लिया है तो आईए अब यह भी देखलें कि वेदों में गैर अनुयाइयों के बारे में क्या कहा गया है।
नम्बर 1
राजा प्रजा के पालने और बैरियों को मारने में उद्यत रहे - अथर्वेद 8-3-7
नम्बर 2
तुम बैरियों का धन और राज्य छीन लो - अथर्वेद 5-20-3
नम्बर 3
सज्जन पुरूष दुखदायी दुष्टों को निकालने में सदा प्रयत्न करे - अथर्वेद 12-2-16
नम्बर 4
है राजन प्रत्येक निंदक कष्ट देने वाले को पहुंच और मार डाल - अथर्वेद 20-74-7
नम्बर 5
तू वेद निंदक पुरूष को काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूंक दे, भष्म कर दे - अथर्वेद 5-12-62
नम्बर 6
वेद विरोधी दुराचारी पुरूष को न्याय व्यवस्था से जला कर भष्म कर दे - अथर्वेद 5-12-61
नम्बर 7
उस वेद विरोधी को काट डाल, उसकी खाल उतार ले, उसके मांस के टुकड़े को बोटी-बोटी कर दे, उसकी नसों को ऐंठ दे, उसकी हडिड़्यों को मसल डाल, उसकी मींग निकाल दे, उसके सब जोडों और अंगों को ढीला कर दे - अथर्वेद 12-5-65 से 71 तक

हम महेंद्रपाल जी को यह भी बता दें कि कुरआन के अनुसार शत्रु पक्ष से इस प्रकार के बरताओ की युद्ध क्षेत्र में भी अनुमति नहीं है।
यह तो वेदों की बात थी। गीता में एक पूरा अध्याय इसी विषय पर है। जिसमें श्री कृष्ण अर्जुन को युद्ध करने पर आमादा करते हैं। जबकि वह हथियार रख चुके थे परन्तु श्री कृष्ण ने उनसे कहा कि यह तो कायरता है तुम्हारा धर्म ही युद्ध करना है। युद्ध करो वरना अधर्म हो जाएगा तुम युद्ध में मारे गये तो स्वर्ग को प्राप्त होगे और अगर जीते तो दुनिया की दौलत पाओगे (मज़े की बात यह है कि कृष्ण जी जिन लोगों से युद्ध करने को कह रहे हैं उनके साथ स्वयं महाराज ने अपनी फौज खड़ी की हुई है) क्यों? क्या इसलिए कि जो भी जीते वही आभारी रहे?
नतीजा यह हुआ कि एक बड़ी भयानक जंग हुई जिसमें महाभारत के अनुसार एक अरब छियासठ करोड़ इन्सान मारे गए। मरने वालों में कुछ लोग कृष्ण जी के सेना के भी होंगे। अपने ही लोगों को अधर्मों की सफ में खड़ा करके मरवा डाला? यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि उक्त आयतों से संबन्धित इस्लामी जंगों में मारे जाने वालों की कुल संख्या दो सौ से अधिक नहीं है। और महाभारत में कुल कितने मारे गए यह अभी पढ़ा ही है।
और महेंद्र पाल जी! इस्लाम में तो केवल चंद आयतें ही युद्ध की प्रेरणा देती हैं वह भी कड़ी शर्तों के साथ केवल आत्मरक्षा में, मगर आपके यहां तो महाभारत और रामायण दो बड़ी धार्मिक इतिहास पुस्तकें ऐसी हैं जिनका आधार ही युद्ध है। और वेदों के मंत्र अलग रहे। इसे ही कहते हैं छाज बोले तो बोले, छलनी भी बोले। जिसमें बहत्तर छेद।
महेंद्रपाल जी के पत्रक का शीर्षक है ‘‘कुरआन में गैर मुस्लिमों को जीने का हक नहीं’’ ।
यह शीर्षक जिसने भी लिखा है वह कोई अनपढ़, नासमझ और इतिहास के ज्ञान से नाबलद व्यक्ति ही हो सकता है। इस प्रकार की बातें लिखने, सोचने और कहने वालों को क्या यह मालूम नहीं कि भारत में कुरआन के मानने वालों ने कई शताब्दियों तक अपने आहनी पंजों से हुकूमत की है फिर भी मुसलमान यहां पर एक छोटी सी अल्पसंख्यक कम्यूनिटी है और महेंद्रपाल जी आप की मम्यूनिटी एक बहूसंख्यक वर्ग है। यह बात विचारणीय है कि अगर सैकड़ों साल कुरआन के मानने वालों ने यहां पर हुकूमत की है और आपके अनुसार कुरआन गैर मुस्लिमों को जीने का हक नहीं देता तो आप यह इल्जाम देने के लिए  कैसे बचे रह गए.....?
किसी ने सही कहा है:
मौक़ा मिला जो लम्हों का अहसान फरोश को।
सदियों में जो किया था वो अहसान ज़द पे है।।
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अब हम उस विषय पर आते हैं जिस पर हमें वास्तव में बात करनी थी ।
इस परिपेक्ष में हम देखेंगे कि क्या वाकई महेन्द्रपाल महबूब अली थे और साथ ही मौलवी या हाफिज़ भी थे या वह केवल दूसरों को भ्रमित करने के लिये महज अफवाह फैला रहे हैं।
महेन्द्रपाल का आपत्ति पत्र 8 पृष्ठों का हिन्दी में टाइप शुदा है जिसमें कुरआन के हवाले हाथ के लिखे हुये हैं।  यकीनन यह महेंन्द्र जी ने स्वयं लिखे होंगे क्योंकि वे अपने दावे के अनुसार मौलवी हैं और अगर किसी और से लिखवाये हैं तो भी महेंद्र जी ने इसे जारी करने से पहले गहराई से पढ़ा तो अवश्य होगा। उनका यह पत्रक इन्टरनेट पर गत कई वर्षों से मौजूद है।
प्रथम दृष्ट्या उनके पत्रक में स्वयं उनके हाथ की लिखी अरबी इबारत को देख कर नहीं लगता कि यह लेख किसी मौलवी या हाफिज़ का है। अधिक से अधिक उस का स्तर कक्षा 2 या 3 के छात्र का प्रतीत होता है उस में इमले व व्याकरण की बलन्डर त्रूटियां इस कदर हैं कि उन्हें देखकर लगता है कि ऐसा कथित मौलवी अगर मुसलमानों के बीच रहता तो उन्हें गुमराह करने के सिवा कुछ न कर सकता। महेन्द्रपाल के आठ पृष्ठों के पत्र के पहले पृष्ठ पर कुरआन के हवाले से चार आयतें लिखी हैं।
न. 3 पर यह इबारत है - (पी.डी.एफ फाइल पृष्‍ठ 18 पर चित्र देखें)

बॉक्स की इबारत महेन्द्रपाल के पत्रक के पहले पृष्ठ से ली गई है चलिये इसी इबारत पर महेन्द्रपाल के सही या गलत होने का फैसला हो जाये । वह इस प्रकार कि अरबी में लिखी जिस इबारत को जिस का मूल उच्चारण उन्होंने स्वयं अरबी इबारत के ऊपर और अनुवाद नीचे दिया है। और उसे कुरआन की आयत कहा है। वह इस इबारत को कुरआन के तीस पारों मे कहीं दिखा दें तो उनकी सारी बातें सही। वरना उन्हें और उनके भक्तों को यह मान लेना चाहिए कि वह समाज को धोखा दे रहे हैं।
उन्‍होंने ने उक्त अरबी इबारत का अनुवाद यह किया है - एक इस्लाम ही हक है और सब कुफ्र हैं, सब को बातिल किया। यह अरबी भाषा के ज्ञानी बताएंगे कि क्या यह अनुवाद सही है? इस इबारत का सही अनुवाद यह है-  इस्लाम हक़ है और कुफ्र बातिल है, यह तो अरबी जानने वाला व्यक्ति ही समझ सकता है कि जो अनुवाद महेन्द्रपाल ने उक्त इबारत का किया है ऐसे व्यक्ति को क्या मौलवी तसलीम किया जाए। या मौलवियत के नाम पर दाग? जिस व्यक्ति ने एक या दो दर्जा ही अरबी पढ़ी हो वह अवश्य इस प्रकार का अनुवाद कर सकता है। मेहन्द्रपाल जी जिस प्रकार की अरबी लिखते हैं या अरबी का अनुवाद करते हैं उसे देख कर लगता है कि किसी गैर मुस्लिम ने बोझल मन से इस्लाम पर एतराज करने के लिये अरबी सीखी है मैं कई ऐसे गैर-मुस्लिम भाईयों को जानता हूं जिन्‍हों ने शोकिया या उर्दू अध्यापक की नौकरी पाने के लिये उर्दू सीखी है। परन्तु इस प्रकार कोई भाषा सीखी जाए कि न तो उसे पूरा समय दिया जा सके और न ही पूरे मन से उसे सीखा जाए, ऐसे व्यक्तियों द्वारा सीखी गई कोई भी भाषा पुख्ता नहीं हो सकती। उस व्यक्ति के बारे में आपकी क्या राय है? जो अंग्रेजी शब्द Station  को istashan  लिखे या  Light  को Lait  या High को Hai लिखे। बस यही हाल बल्कि इससे भी अधिक बुरा हाल महेन्द्रपाल का है उन्‍हों ने इसी प्रकार के कुछ प्रश्न इन्टरनेट पर डाले थे जिसका कई लोगों ने उत्तर दिया है। इस को विस्तार से www.islamhinduism.com पर देखा जा सकता है। यह उसी पत्रक की नकल है जिसका हमने चर्चा किया उसे देखिए और महेन्द्रपाल जी के हाल पर मातम कीजिए, उस में  महेन्द्रपाल जी ने कुरआन की एक आयत लिखी है आयत है अत्तलाकु मर्रतान, इसमें शब्द -अत्तलाकु
मर्रतान को महेन्द्र पाल जी ऐसे लिखते हैं اطلاقُ - (पी.डी.एफ फाइल पृष्‍ठ 20 पर चित्र देखें)  
 जब कि इस का सही लिखित रुप है الطلاقُ   इस में  दो अक्षर अलिफ और लाम जो लिखे तो जाते हैं पढने में  नहीं आते  वह महेनद्रपाल जी भूल गये है ऐसी बलन्डर त्रूटी कक्षा 2 का छात्र ही कर सकता है। एक मौलवी से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती ।
महेन्द्रपाल के कलम का एक कारनामा और देखिये।
उन्‍हें  कुरआन की एक अन्य आयत पर भी एतराज़ है। आयत है ‘‘इन्नससलाता तन्हा अनिल फहशाइ वल मुनकर’’ वह इसे
इस प्रकार लिखते है عنل فحشاء  अनिलफहशाइ
का शब्द दो लफ्ज़ों से मिलकर बनता है, एक अन दुसरा अलफहशाइ इसको जब अरबी में लिखा जाता है तो दोनों शब्द अपनी असली सूरत में लिखे जाते हैं। यानि अन अलग और अलफाहशाइ अलग عن الفحشاء लेकिन दोनों को मिलाकर अनिलफाहशाइ पढ़ा जाता है। महेन्द्र पाल जी ने अन और अल को एक साथ लिखा है और फहशा को अलग लिखा है, ऐसी शाब्दिक गलती एक मौलवी से? ....... खुदा खैर करे।

इसी तरह उनका رَؤف بالعباد को  رَء وفم بلعباد लिखना और فیھا को فی ھا लिखना من دون المؤمنین  को من دونِل مومنین लिखना उनकी योग्यता को दर्शाता है। - (पी.डी.एफ फाइल पृष्‍ठ 18 पर चित्र देखें)
उनकी लिखी इबारत को पढ़कर एक पढ़े लिखे इन्सान को केवल हंसी आ सकती है और महेन्द्रपाल के रवैये पर अफसोस ही किया जा सकता है।

हम यहाँ पर महेंद्रपाल जी के हाथ की लिखी पाँच छोटी-छोटी आयतें दे रहें हैं यह पाँच छोटी आयतें दो लाइनों में लिखी जा सकती हैं। इन दो लाइनों में महेंद्रपाल जी ने इमले की दस बलंडर गल्तियां की हैं जिन्हें अरबी भाषा का प्राथमिक विद्यार्थी भी पहली नजर में पकड़ लेगा और महेंद्रपाल जी के कलम के कारनामे पर अपनी हंसी रोक नहीं पाएगा। और अगर उसे यह भी बता दिया जाए कि इन महाशय ने विश्व प्रसिद्ध इस्लामिक विद्वान जाकिर नायक को शास्त्रार्थ के लिए चैलेंज भी किया हुआ है तो वह कहकहा लगाने पर मजबूर हो जाएगा।
महेन्द्रपाल की एक बलन्डर त्रूटी और देखिये, वह अपने अपत्ति पत्र के पृष्ठ न. 6 पर लिखते है हदीस छ: 6 हैं, जबकि हदीस छः नही छः हजार से भी ज्यादा हैं। परन्तु चलिये उनकी इस गलती को हम तसामोह अर्थात अनजाने में हुयी गलती मान लेते हैं और देखते हैं कि इससे उनका तात्पर्य कुछ और तो नहीं। एक विकल्प तो यह है कि शायद वह कहना चाहते हैं। कि हदीस की किताबें  छः हैं परन्तु ऐसा भी नहीं, हदीस की सैकडों  किताबें मौजूद व मशहूर हैं एक आखरी विकल्प जो अधिक सत्य मालूम पड़ता है यह है कि वह ‘‘सिहा सित्ता’’ का वर्णन करना चाहते हैं।


सिहा सत्ता क्या है?
सिहा के मायने, सही और सित्ता के मायने छः के हैं और यह इल्म-ए-हदीस की एक इस्तलाह है। यह शब्द हदीस की उन छः किताबों के लिये बोला जाता है जिनको अधिक महत्व प्राप्त है और वह दर्स-ए-निजामी अर्थात मौलवी के कोर्स में शामिल हैं।
बस हमें  यहीं पहुँचना था । प. महेन्द्रपाल ने जिन किताबों के नाम गिनवाए हैं उन में मिशकात शरीफ का नाम भी शामिल किया है। यही बात खास है।
जिसने हदीस की कोई एक किताब भी खोलकर भी देखी हो वह हदीस 6 होने का दावा नहीं कर सकता, न ही हदीस की 6 किताबें होने का दावा कर सकता। हाँ यह मुमकिन है कि अधकचरे ज्ञान वाला सिहा सित्ता का वर्णन करे और मिशकात को उस फहरिस्त में शमिल कर दे, परन्तु किसी मौलवी से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती। कि वह सिहा सित्ता में मिशकात का नाम लिखे। सिहा सित्ता मौलवी के कोर्स के अन्तिम वर्ष में एकसाथ पढ़ाई जाती हैं पूरे भारत में मिशकात को सिहा सित्ता के साथ कहीं भी नही पढ़ाया जाता अतः यह बात गारन्टी से कही जा सकती है कि जो व्यक्ति सिहा सित्ता मे मिशकात को शरीक बतलाए जिसका कलम
رَؤف بالعباد  को رَء وفم بلعباد और فیھا को  فی ھا लिखे  من دون المومنین  को من دونِل مومنین
लिखे और تنہیٰ को  تَنْہَ  - 
والمنکر  को  ولمنکر ,
 لایتخذُ المومنُ को  لایتخزُ المومنو लिखे, वह कुछ भी हो सकता है मौलवी नहीं हो सकता। - (पी.डी.एफ फाइल पृष्‍ठ 22 पर चित्र देखें)

इन बातों  के दृष्टिगत यह पूरे भरोसे और शतप्रतिशत यकीन से कहा जा सकता है कि महेन्द्रपाल का यह दावा कि वह मौलवी थे निराधार, बेतुका और निरा झूठ है। बल्कि हमें तो इसमें भी शक है। कि वह महबूब अली थे।
उनका मूल निवास स्थान कलकत्ता है। इस समय वह दिल्ली में रहते हैं और आर्य समाज के प्रचारक हैं। दिल्ली में  रहने वाले किसी व्यक्ति का मूल पता कलकत्ते जैसे बडे़ और दुर्गम शहर में तलाश करना बड़ा कठिन कार्य है। परन्तु हम यह जानते है कि बंगला भाषी कलकत्ता शहर का मूल निवासी कितना ही बड़ा विद्वान क्यों न बन जाये बंगाली भाषा का असर उस की जुबान से कभी नहीं जाता इस की उचित मिसाल हमारे राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी है जिनकी अग्रेजी भी बंगाली नुमा होती है। दूसरी ओर महेन्द्रपाल जी है जो अपने भाषण में जिस प्रकार की शुद्ध हिन्दी का प्रयोग करते हैं उसे सुनकर लगता है कि वह दिल्ली के आस-पास किसी हिन्दी भाषी क्षेत्र के निवासी हैं कम से कम उनकी भाषा शैली से यह तो बिल्कुल नहीं लगता कि वह बंगाली हैं।
श्री महेन्द्रपाल का दावा है कि उन्होंने दिल्ली के मदरसा अमीनिया से आलिम (मौलवी कोर्स) से फरागत हासिल की है। उक्त से यह तो साबित हो गया है कि वह किसी मदरसे से सनद याफ्ता आलिम नहीं हो सकते हाँ यह मुमकिन है कि किसी महेन्द्रपाल ने फर्जी नाम महबूब अली रख कर किसी मदरसे में दाखिला ले लिया हो और एक या दो वर्ष अरबी भाषा व आलिम (मौलवी का कोर्स) की शिक्षा प्राप्त की हो। जबकि यह कोई नयी बात नहीं, ऐसी और भी मिसाले सुनने में आती रही हैं और जासूस बनकर मस्जिदों में इमामत कराने की तो बहुत सी मिसालें सामने आ चुकी हैं। महेन्द्रपाल तो किस खेत की मूली हैं। योरोपीय देशों  में इस्लामी शिक्षा के बड़े-बड़े गेर मुस्लिम विद्वान हुये हैं। जिन्‍हें  इस्लामी इस्तलाह में मुशतशरिक कहा जाता है। अरबी भाषा की एक महत्वपूर्ण डिक्शनरी अलमुनजिद एक ईसाई मुशतशरिक  की लिखी हुयी है। सिहा सित्ता (हदीस की छः बड़ी किताबें)की कुल हदीसों को अरबी अलफाबेट्स की श्रंखला के अनुसार जमा करने का कार्य भी एक योरोपीय मुशतशरिक ने किया है। शायद महेन्द्रपाल भी उन्हीं की चाल चले हैं परन्तु कव्वा चला हंस की चाल तो अपनी चाल भी भूल गया के अनुसार बिना मेहनत मुशक्कत के साल दो साल किसी मदरसे मे धोखा देकर रहे और आंजनाब का इमला तक सही न हो सका। ऐसे व्यक्ति को क्या हक है कि वह कुरआन का अनुवाद करे और उलटा सीधा आक्षेप कुरआन पर लगाये।
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यह तो महेन्दर पाल जी की योग्यता का विश्लेषण  था। आइये एक और दृष्टिकोण से इन महाशय का विश्लेषण करते हैं।
महेन्द्रपाल जी स्वयं को पंडित लिखते हैं और पंडिताई का कार्य करते हैं। उनके कहने के अनुसार वह पहले मुसलमान थे फिर वह हिन्दू धर्म के अनुयाई बन गये। हिन्दू धर्मानुसार पंडिताई का कार्य केवल ब्राह्मण    कर सकता है। और ब्राह्मण  जन्म जात होता है भारत में जो जाति प्रथा है। उस में यों ही कोई एक जाति का व्यक्ति दूसरी जाति का सदस्य नहीं बन सकता। हिन्दू धर्म की महत्वपूर्ण ग्रन्थ वेद एवं मनुस्मृति हैं उनके अनुसार हिन्दू समाज चार खानों में  विभाजित है ब्राह्मण , क्षत्रिय, वेशः एवं शूद्र। इनके अतिरिक्त जो भी हैं वे मलेच्छ (नापाक और अपवित्र) हैं इस व्यवस्था में धर्म की शिक्षा प्राप्त करना और शिक्षा देना केवल बृहमण का कार्य है। और शूद्र अगर शिक्षा प्राप्त करे तो उस के लिये कड़ी सजा का प्रावधान है। यहाँ प्रश्न यह है कि महेन्द्रपाल जब महबूब अली से महेन्द्रपाल बने तो उन्होंने कौन सा वर्ण ग्रहण किया। वह पहले मलेच्छ थे अर्थात शुद्र से भी नीचे। उन्होंने अपना शुद्धिकरण कराया, तो भी वे अधिक से अधिक शुद्र की श्रेणी में आ सकते थे। क्‍यों कि ‘‘तोहफतुल हिंद’’ के लेखक जिनका पहला नाम ‘‘अनंत राम’’ था और उन्होंने इस्लाम कुबूल करने के बाद अपना नाम मुहम्मद उबैदुल्लाह रखा उन्होंने अपनी मशहूर किताब ‘‘तोहफतुल हिंद’’ में कर्मव्याक के हवाले से लिखा है कि अगर कोई शुद्र पुन्य के कार्य करे तो वह अगले जन्म मे वेशः की योनी में जाता हैं और अगर कोई वेशः पुनः के कार्य करे तो व क्षत्रीय की योनी में। ऐसे ही क्षत्रिय ब्राह्मण  की योनी में और ब्राह्मण   पुन्य  करे तो उसकी मुक्ति हो जाती है।
परन्तु यह व्यवस्था तो मरनोपरान्त की है, प्रश्न यह है कि महेन्द्रपाल जी जीते जी ब्राह्मण  कैसे बन गये हैं।
यहाँ पर एक विकल्प और भी है उसे समझने के लिये हमें जानना होगा कि भारत में  दो प्रकार के मुसलमान पाये जाते हैं अधिक संख्या तो उनकी है जो यहीं के मूल निवासी थे और यहां किसी जाति से सम्बन्धित थे, दूसरे जो (कम संख्या में  हैं) वह बाहर से आये हुये हैं जो हिन्दू धर्म ग्रन्थों के अनुसार मलेच्छ थे जिनका वर्णन ऊपर किया गया। अगर महेन्द्र पाल जी इसी दूसरे वर्ग से थे तो उन्हें यह अधिकार किसने दिया कि वह हिन्दू बनते ही उस के उच्च और स्वर्ण वर्ग में जा बैठें। और अगर वह मुसलमान रहते, पहले वर्ग से अर्थात उस वर्ग के मुसलमानों में से थे जो यहीं के मूल निवासी  हैं तो यकीनन वह यहाँ की किसी न किसी जाति से सम्बन्धित रहे होंगे और उस में ब्राह्मण  जाति भी हो सकती है। परन्तु यहां हमें यह याद रखना होगा कि भारतीय मुसलमानों  में  वे सभी जातियाँ पाई जाती है जो हिन्दुओ में हैं उदाहरण के बतोर जाट हिन्दू भी हैं मुसलमान भी हैं गुर्जर हिन्दू भी मुसलमान भी हैं। परन्तु कहीं ऐसा अवश्य हुआ है कि किसी जाति ने मुसलमान होकर अपने जाति सूचक शब्द का उर्दू में अनुवाद करके उसे अपना लिया जैसे कुम्हार जिसका कार्य बर्तन बनाना है जब इस जाति के लोग मुसलमान हुये तो वह कूज़गर कहलाये इस का अर्थ भी वही होता है यानी बर्तन बनाने वाला-तात्पर्य यह कि हर वह जाति जो हिन्दू समाज में पायी जाती हैं। वही सभी जातियां मुसलमानों में  भी पायी जाती है। अर्थात यहां की सभी जातियों के कुछ न कुछ व्यक्तियों ने इस्लाम धर्म अवश्य कबूल किया है। परन्तु हमें  यह भी याद रखना चाहिए कि भारत वर्ष की दो जातियाँ ऐसी है जो मुसलमानों में नहीं पायी जाती। स्पष्ट है कि उन जातियों ने इस्लाम धर्म कबूल नहीं किया होगा। वे दो जातियां हैं एक चमार और दूसरा ब्राह्मण। इस तथ्य के दृष्टिगत हम यह कह सकते हैं कि महेन्द्रपाल जी जो पूर्व में उनके कथनानुसार महबूब अली थे वह ब्राहमण समाज से कनवर्ट होकर बिलकुल नहीं आए थे कि घर वापसी के बाद वह ब्राह्मण(पंडित) बन गये। परन्तु महेन्द्रपाल जी ने तो हिन्दू धर्म स्वीकार करके पंड़िताई शुरु कर दी और इस प्रकार वह अधर्म के पात्र हुए।
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यह महेन्द्र जी की काबलियत पर विचार था। आइये इस बात पर विचार करते हैं कि उन्हांेने अपने बकौल जिस धर्म को छोड़ा है क्या वह अपने जीवन में उसे पूर्णतः छोड़ चुके हैं या अभी भी अपनी जीवन व्यवस्था उसी छोड़े हुये के अनुसार व्यतीत करने पर विवश हैं।
जैसा कि हम ने लिखा कि वह पंडित नहीं थे परन्तु पंडिताई का कार्य कर रहे हैं इस प्रकार वे हिन्दू धर्म के मूल सिद्धान्त से हट गये हैं।
इस पर वह कह सकते है कि आज का समय समानता का समय है अब हर व्यक्ति को यह अधिकर है कि वह कुछ भी करे कुछ भी पढे़ और किसी को पढ़ाए। धार्मिक शिक्षा प्राप्त करे और धर्मिक शिक्षा का दूसरों को ज्ञान दे। परन्तु यह तो आप जानते ही होगें कि यह शिक्षा इस्लाम की है और उसी ने सब से पहले इसे दुनिया के सामने रखा और संसार की तार्किक शक्ति, उसके विवेक और बुद्धि ने उसे पुणत: अपनाने और अपने जीवन में उतारने पर आप को विवश कर दिया है। और आप हैं कि इसे अपनाने पर मजबूर है जबकि यह हिन्दुत्व के बुनियादी सिद्धान्तों के विपरीत है।
केवल यह एक उदाहरण नहीं अपितु अपकी जीवन व्यवस्था का 95 प्रतिशत भाग ऐसा है जिसे आप इस्लामी कानून के अनुसार जीने पर मजबूर हैं। उस धर्म की शिक्षा, जिसको आपने अपनाया है और आप के गुरु स्वामी दयानन्द  जी जो हिन्दुओं के लेटेस्ट रिफॉर्मर हैं उन्होंने लिखा है कि
शुद्र वेद का ज्ञान तो प्राप्त कर सकता है परन्तु उपनयन न करे-
           सत्यार्थ प्रकाश, सम्मुलास 3
मैं आपसे से पूछना चाहूंगा कि क्या आप इस नियम को अमली जामा पहना पायेगे? बिल्कुल नहीं। अगर आप ऐसा करना चाहेंगे तो देश का कानून आप को ऐसा करने नहीं देगा और इस में जो कुछ आप स्वीकार करने पर मजबूर हैं वही तो इस्लामी शिक्षा है।
एक दूसरा उदाहरण देखें  -
स्वामी दयानंद जी ने सत्यार्थ प्रकाश के चौथे सम्मुलास में करीब 10 पृष्ठों में इस बात का बखान किया है कि अगर कोई महिला बिना औलाद के विधवा हो जाए या किसी और कारण से उसको बच्चा न हो सका हो तो वे नियोग द्वारा बच्चा पैदा कर सकती है। मैं पूछना चाहूंगा कि अगर आपकी पत्नी को बच्चा पैदा न हो सके तो क्या आप उसे अनुमति देंगे कि वह किसी दूसरे मर्द के साथ रात गुज़ार आये और उसके द्वारा गर्भवती होकर आए। अगर आप ऐसा करना चाहेंगे तो आपकी पत्नी ही इस के लिये सहमत नहीं होगी, फिर भी आप अगर उस से ऐसा ही करायेंगे तो समाज की निगाहों में गिर जायेंगे। अर्थात वह जिस पर आप अमल पैरा हैं या जिसे समाज स्वीकार करता है वह यह कि आप की पत्नी को आपके अतिरिक्त कोई और न छुए।  यह हिन्दू धर्म के विरुद्ध और इस्लाम धर्म के पुर्णत: अनुकूल है।
 तीसरा उदाहरण
आप के घर बच्चा पैदा होता है। स्वामी जी कहते हैं कि उसकी माँ छः दिन के उपरान्त उसे अपना दूध न पिलाये(सत्यार्थ प्रकाश 5-68) जबकि मार्डन मैडिकल शोध कहता है कि दो वर्ष तक माँ का दूध ही उसके लिये उपयोगी भोजन है। ऐसी स्थिति में आप का पक्ष क्या होगा? यह भी याद रखये कि बच्चे को दो वर्ष तक माँ का दूध पिलाने की ताकीद कुरआन में है (कुरआन 31:14 )
अभी तक हम ने आपके धर्म के तीन सिद्धांतों पर बात की। चलिये कुछ इस्लामिक सिद्धांतों की बात करलें जिस को आपने छोड़ दिया है मगर वह आप से छूट नहीं पायंेगे और उन्‍हें  आप चाह कर भी छोड़ नहीं सकते। आप अगर मुसलमान हैं और इस स्थिति में आप के पास एक विशेष मात्रा में  धन आ जाए तो आप को एक विशेष प्रकार का टैक्स देना होता है जिसे ज़कात कहते हैं। अब आपने इस्लाम धर्म को छोड़ दिया है परन्तु यह नियम अब भी आप का पीछा कर रहा है और आज भी अगर आप के पास उसी विशेष मात्रा में धन आ जाता है तो आपके लिये सरकार को आयकर देना अनिवार्य है। अदभुत संयोग देखिये कि धन की वह विशेष मात्रा जो इस्लाम धर्म ने इस्लामी टैक्स (ज़कात) लेने के लिये निर्धारित की थी, जो आज के समय में  आज के दौर की करीब नौ तोले सोना या उसकी क़ीमत बनती है। वही मात्रा आज तक आपके देश की सरकार भी फालो करती आ रही है। आप ज़रा यह एलान तो करें कि आपके पास साढ़े सात तोले सोना; जो आज के समय का करीब़ नौ तोले बनता है। उस की कीमत का धन है। फिर आप देखिये कि सरकार उसकी ज़कात अर्थात आयकर आप से वसूलती है या नहीं।
एक उदाहरण और देखिये न्याय सम्बन्धि इस्लामी कानून सब के लिये समानता का आदेश देता है, उस में जन्म और जाति की बुनियाद पर भेद नहीं किया जा सकता। महेन्द्रपाल जी ने उसे छोड़ दिया है और मनुस्मृति का यह कानून अपना लिया है कि ब्राह्मण के लिए अलग नियम होंगे और शुद्र के लिए अलग। एक शुद्र की गवाही शुद्र ही दे सकता है, ब्राह्मण के लिए अलग प्रकार की शपथ है और शुद्र के लिये अलग प्रकार की।
परन्तु हमारे देश की अदालतें  मनु की व्यवस्था को छोड़ इस्लामी व्यवस्था पर अमल करती हैं, महेन्द्रपाल को चाहिये कि वह कम से कम भारत सरकार के सामने यह परस्ताव रखें  कि उन्‍हों ने (महेन्द्रपाल ने) इस्लामी नियमों को छोड़ कर घर वापसी कर ली है अब सरकार को भी चाहिये कि वह भी घर वापसी करते हुये कुरआन के नियम को छोड़कर मनुस्मृति के नियमों का पालन करे।
इस प्रकार के कोई एक दो उदाहरण नहीं हैं सारी व्यवस्था ही इस्लामी हो गई है। 2006 में सरकार ने यह परस्ताव पारित किया था कि बाप की जायदाद में बेटे की भांति बेटी भी हिस्सेदार होगी, महेन्द्र जी को यह ऐलान करना चाहिये था कि हम इस कानून को नहीं मानें गे, क्योंकि यह इस्लामी कानून है जिसे हम छोड़ आये हैं और हिन्दू व्यवस्था में पुत्री पराया धन होती है उसके पूर्वज भी वह होते हैं जो उसके पति के पूर्वज हैं । अतः उसके मूल पूर्वजों की सम्पत्ति में उसका कोई हक़ नहीं होता।
यहां एक मशहूर हदीस का वर्णन करना उचित होगा। हजरत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया था कि क्यामत उस वक्त तक नहीं आएगी जब तक इस्लाम की आवाज पूरे विश्व के एक-एक मनुष्य के घर में न पहुँच जाए, इज़्ज़त वाला इज़्ज़त से मान लेगा और ज़िल्लत वाला ज़लील होकर मानेगा।
इस परिपेक्ष में हम कहना चाहेंगे कि हमने ऊपर जो इस्लामी सिद्धांत बयान किए हैं अर्थात समानता, सब के लिए शिक्षा, बाप की जायदाद में बेटी का हिस्सा, अपनी पसंद का धर्म स्वीकार करने की आज़ादी वगैरा-वगैरा। क्या ऐसा नहीं है कि अब वह समय आ गया है कि या तो महेंनद्रपाल जैसे लोग इन्हें इज़्ज़त से मान लें, जबकि वह उनके धर्म के खिलाफ है और अगर वह उन्हें इज़्ज़त से नहीं मानेंगे तो वक्त का आहनी पंजा उन्हें ज़लील करके अपनी बात मनवायेगा।
हमने जो हदीस बयान की है उसमें इस्लाम का कलिमा हर घर में दाखिल होने की बात है। अरबी का शब्द कलिमा एक उमूमी शब्द है उसका मूल अर्थ होता हैः ‘बात’। गालिबन इससे मुराद इस्लामी नियम व कानून हैं जो आज पूरी दुनिया में अपनी किसी न किसी सूरत में लागू हो चुके हैं, जबकि वे लगभग सभी हिंदू धर्म व्यवस्था के विपरीत हैं।  जहां तक हिंदू धर्म व्यवस्था की बात है वह तो इस समय कतई असम्भव है (विस्तार से जानने के लिए देखें लेखक की  पुस्तक ‘‘हिंदू राष्ट्र सम्भव या असम्भव? ब्लाग पर आनलाइन उपलब्ध)।

आज के मानव समाज ने इस्लाम की शिक्षा अर्थात इस्लामी कानून व व्यवस्था को (सिद्धांत) पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया है। हां उसे अल्लाह और उसके रसूल के नाम से अवश्य ही बैर बाकी है। शायद इसी चीज के लिए कुरआन में एक ओर तो यह कहा गया है कि धर्म के मामले में कोई जोर जबरदस्ती नहीं की जा सकती जो चाहे स्वीकार कर ले ओर जो चाहे इन्कार कर दे(सूरह बक़र 256)। और दूसरी और महेंद्रपाल जैसे हठधर्मियों के दृष्टिगत उन जैसों को सम्बोधित करते हुए कहा गया है।
‘‘यह अल्लाह के दीन को छोडकर कहां भटक रहे हैं जबकि आसमान व ज़मीन में जो कुछ भी है उसने तो स्वेच्छा से इस्लाम स्वीकार कर लिया है। (आल ए इमरान 83)
  औरों से तो शिकायत क्या कि वह इस्लाम के बारे में जानते नहीं परन्तु महेन्द्र जी! आप तो कथित फारिगुत्तहसील आलिम थे आपको तो यक़ीनन मालूम होगा, और यह भी मालूम होगा कि इस्लामी सिद्धान्त के अनुसार दो हिस्से पुरुष के और एक हिस्सा स्त्री का होता है। देखें सुरह नम्बर 4:11  कुरआन, अर्थात 33 “ लडकी का और  66 “ लड़के का।
और आपको यह भी मालूम ही होगा कि महिला आरक्षण बिल में यही व्यवस्था रखी गयी है। जिसमें राज्य सभा में बहस होकर यह प्रस्ताव पास हुआ है कि महिला आरक्षण बिल में 33 प्रतिशत भाग महिला का होगा और 66 प्रतिशत पुरूषों का।

महेन्द्र जी! आप तो प्रख्यात पंडित हैं और दिल्ली में रहते हैं सरकार को बताइये कि यह इस्लामी व्यवस्था है। जिसे आप छोड़ आये हैं ।
कहने का मतलब यह है कि इस्लामी नियम कानून स्वभाविक हैं और स्वभाव का विरोध संभव नहीं परन्तु किसी ने विरोध की ही ठानी है तो वह स्वयं का ही नुकसान करेगा क्योंकि आसमान का थूका मुंह पर आता है ।
सच्चाई का विरोध इसलिए कि वह दूसरे का बताया हुआ है अतः आप उसके विपरीत जायेंगे  यह घटिया दर्जे की संकीर्णता है।
इस का एक छोटा सा उदाहरण और देखें -
इस्लामी कानून कहता है कि आप लघुशंका के बाद मूतेन्द्री को धोएं और पानी उपलब्ध न हो तो मिटटी के ढेले आदि से उसे शुष्क करलें ताकि वह वस्त्र एवं शरीर पर न लगे। परन्तु आप का नियम कहता है कि बचे-कुचे पेशाब को कपडे़ और शरीर पर ही लगने के लिये छोड़ दें।  परन्तु आप हैं कि लघुशंका के बाद हाथ फिर भी अवश्य धोते हैं। क्यों? अब आप इस्तनजा करें तो मुस्लमान कहलायें और न करें तो शरीर गंदा हो, आप तो खतना से भी न बच सके होंगे कि महर्षि स्वामी जी की सोच के अनुसार मूतेन्द्री की ऊपरी खाल बचे-कुचे पैशाब को सोख लेने के लिये है ताकि पेशाब की बूदें कपड़े और शरीर पर न लगें। खतना पर एक बात और याद आयी। वह यह कि मुसलमानी (खतना) भी आप के साथ ऐसी ही लगी रह गयी जैसे स्वभाव के नियम जिसे आप चाह कर भी नहीं छोड़ सकते और बचपन में अपनी मूतेन्द्री की कटी खाल को जब आप मुसलमान रहते , श्री0 मुजफ्फर अली के घर में पैदा हुये थे (अगर अपने इस दावे में सच्चे हैं) आप वापस नहीं ला सकते ।
 दरअसल आपकी मिसाल ‘‘आसमान से गिरा खजूर में अटका’’ जैसी है। यदि आपने घर वापसी करते हुये आर्य समाज को अपनाया है, आर्य समाज सनातन कहाँ है? उसको आरम्भ हुये तो अभी दो सौ वर्ष भी नहीं हुये। जब हिन्दू ही बनना था तो वह हिन्दू धर्म अपनाते जो अनादि से है और शास्वत और सनातन है।
खैर यह तो आपका पर्सनल मामला है जो चाहें  स्वीकार करें  और जो चाहे त्याग दें । परन्तु इस बात का भी ध्यान रखिये कि अपकी भाषा और लेखादि में भी गुरु का असर झलकता है मुसलमानों का खुदा ऐसा है मुसलमानों का खुदा वैसा है , यह अच्छी भाषा शैली नहीं है।
यह आप सभी का तर्ज-ए-तहरीर है - ईश्वर-ईश्वर है, उसे ईश्वर कहिये, प्रभु कहिये या गॉड कहिये या खुदा कहिये, आप ऐसा कह सकते है कि खुदा, ईश्वर, प्रभु ऐसा नहीं कर सकता, वैसा नहीं कर सकता परन्तु -
बात करने का सलीका नहीं नादानों  को
 बात असल में यह है कि ‘छोटा मुंह बड़ी बात’  महेनद्रपाल जी की आदत है। उन्होंने आज कल ज़ाकिर नायक को चेलेंज करते हुये एक ऐलान नामा इण्टरनेट पर डाला हुआ है कि ज़ाकिर नायक उनसे शास्त्रार्थ करें, अगर जाक़िर नायक उन्हें हरा देंगे  तो वह मंच पर ही इस्लाम स्वीकार कर लेंगे। क्या जाक़िर नायक इस हद तक निचले स्तर पर उतर आए कि उस व्यक्ति से शास्त्रार्थ करने आ जायें जो पांच लाइनों में दस इमले की गलतियाँ करे, मुझे तो महेन्द्रपाल का यह ऐलान देखकर ‘धर्ती पकड़’ की याद आ जाती है, खुदा मालूम बेचारा इस दुनिया में  है या आँ जहानी हो गया। हमेशा राजीव गाँधी या इन्दिरा गाँधी जैसों के मुकाबले स्वतन्त्र उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा करता था। इस प्रजा तांत्रिक दौर में किसे रोका जा सकता है। सब स्वतंत्र हैं, चाहे धर्तीपकड़ राजीव गाँधी के मुकाबले चुनाव लडे़ या महेन्द्रपाल जाक़िर नायक को चुनौती दें क्या मजाल जो राजीव गाँधी या ज़ाकिर नायक चूँ भी कर सकें।
महेंद्रपाल जी की एक किताब ‘‘वेद और कुरआन की समीक्षा’’ के नाम से है पूरी किताब में जो फहवात बकी गयी हैं उससे उनकी ज़ेहनियत का पता चलता है। किताब इस लायक नहीं है कि पूरी किताब की समीक्षा कर मैं अपने लेख को बोझल करूं केवल एक आध उदाहरण से ही उनकी समीक्षा के स्तर का अन्दाज़ा हो जाएगा। उनकी किताब के पृष्ठ 7 व 8 का भाग देखें, महेंद्रपाल जी ने कुछ इबारतें लिखी हैं। वह यह ज़ाहिर करना चाहते हैं कि कुरआन में उस जैसी सूरा (अध्याय) बनाने का जो चैलेंज किया गया है महेंद्रपाल जी ने उसे स्वीकार कर लिया है। महेंद्रपाल जी के  हाल पर हंसी आती है उन्होंने कुरआन ही के शब्दों की उलटफेर से कुछ पंक्तियां घड़ी हैं, इमले की बलंडर त्रुटियों पर यहां भी आपको हंसी आएगी, पहली पंक्ति देखें
(पी.डी.एफ फाइल पृष्‍ठ 37 पर चित्र देखें)

 शब्द हिया, वह के अर्थ में है यह शब्द सर्वनाम है ,अरबी भाषा की प्रारंभिक कक्षाओं में अरबी के सर्वनाम रटा कर याद कराए जाते हैं। खास बात बताने की यह है कि ‘हिया’ सर्वनाम छोटी हा से लिखा जाता है जबकि महेंद्रजी ने उसे बडी हा से लिखा है। अगर कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति जो अपने को गुरूकुल से एम. ए. या शास्त्री की डिग्री पास बताए और स्त्री को इसतरी या पुरूष को पुरुश लिखे उसके बारे में आपका क्या खयाल है? हां कक्षा 2 के छात्र से ऐसी त्रुटि की उम्मीद की जा सकती है।
  निम्न लिखित पंक्तियो में लगभग सभी शब्द कुरआन के हैं बस महेंद्रपाल जी ने बीच में ओउम शब्द अरबी भाषा में लिखकर अपनी योग्यता का प्रमाण देने का नाकाम प्रयास किया है।


(पी.डी.एफ फाइल पृष्‍ठ 38 पर चित्र देखें)
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प्रश्न यह है कि ऐसे व्यक्ति को क्या जवाब दिया जाए और क्या ऐसे व्यक्ति की बातों को संजीदगी से लिया जाए जो स्वयं कुरआन के शब्दों से लाइनें घड़कर उन्हें कुरआन जैसी आयतें बतलाए। फिर भी यह महाशय हैं कि ज़ाकिर नायक जैसी विश्व प्रसिद्ध हस्ती को चैलेंज करते हैं।
   क्या ऐसे व्यक्ति को इस लायक समझा जाए कि उसके शास्त्रार्थ के चैलेंज को महत्व देते हुए उसे स्वीकार किया जाए। यह निर्णय पाठकों को करना है। 
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श्रीमान महेंद्रपाल जी के द्वारा इन्टरनेट पर एक वीडियो डाली गयी है जिसका शीर्षक है महेंन्द्रपाल ने डाक्टर ज़ाकिर नायक के उस्ताद अब्दुल्लाह तारिक को हराया।
पहली बात तो यह है कि उक्त विडियो जिस प्रोग्राम की है वह कोई शास्त्रार्थ का प्रोगराम नहीं था अपितु आपसी भाईचारे पर आधारित प्रोग्राम था और अगर महेंद्रपाल जी उसे शास्त्रार्थ ही का प्रोग्राम मानते हैं तो फिर बताएं उसमें जज किसे नियुक्त किया गया था, उसमें अधिक संख्या महेन्द्रपाल जी के अनुयाईयों की थी उन्होंने ही प्रोग्राम का आयोजन किया था, और अब्दुल्लाह तारिक को बतौर अतिथि बुलाया गया था।
अब्दुल्लाह तारिक रियासत रामपुर के रहने वाले मशहूर इस्लामी स्कालर हैं उनके प्रोग्राम पीस टीवी से प्रसारित  होते रहते हैं। परन्तु जाक़िर नायक से उनका कोई गुरू-शिषय का संबंध नहीं है बल्कि उनकी जाक़िर नायक से एक दो मुलाकातों के अलावा अन्य कोई राबता नहीं है। ऐसे में उनको ज़ाकिर नायक का उस्ताद लिखना केवल अज्ञानता है।
जहाँ तक उनको हराने की बात है। नेट पर मौजूद विडियो में ऐसी कोई बात नहीं दिखती। महेंद्रपाल और अब्दुल्लाह तारिक की बातचीत की इस विडियो को देखकर लगता है कि महेंद्रपाल सच्चाई को जानने समझने और सही बात को मानने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है बल्कि आक्रमक अंदाज में बेवजह चीख रहे हैं। जबकि अब्दुल्लाह तारिक सभ्यता और शाइस्तगी से बात समझाने का प्रयास कर रहे हैं।
इस विडियो में महेंद्रपाल ने अपनी बात का आरंभ जिस नुक्ते से किया है उसका खुलासा यह है कि उनके पास जो कुछ है वह धर्म है और अन्य लोग (मुसलमान आदि) जिसे मानते हैं वह मज़हब है। यह वह नुक्ता है जिसे आजकल हिंदू मिथ्यालोजी के बड़े बड़े फलासफर पेश कर रहे हैं इनका मानना है कि धर्म बड़ी चीज़ है क्योंकि वह जीवन जीने की एक सम्पूर्ण पद्धति है और मजहब कोई छोटी चीज होती है क्योंकी वह पूजा पद्धति मात्र है। यानि
‘‘अंधे को अंधेरे में बहुत दूर की सूझी’’
यह बात केवल वह व्यक्ति कह सकता है जो मुसलमानों के बारे में सिर्फ इतना जानता हो कि मुसलमान या इस्लाम बस इस चीज का नाम है कि मस्जिद में जाकर नमाज़ पढ़ आयें और रमज़ान का महीना आया तो रोज़े रख लिए। और मौका हुआ तो हज कर आए। महेंद्रपाल जी का इस बात पर दूसरों के सुर में सुर मिलाना केवल उनके इस दावे को संदिग्ध करता है कि वह पहले महबूब अली थे क्योंकि जानकारों को यह मालूम है कि दुनिया के तमाम धर्मों में केवल इस्लाम ही एक एसा धर्म है जो नाखून काटने और  जूता पहनने से लेकर हुकूमत करने तक के मामलों में एक-एक बात पर रहनुमायी पेश करता है और आज उसके पेशकरदा नियमों को सम्पूर्ण दुनिया मानने को मजबूर है। वर्तमान में कई देशों में इस्लामी सिद्धांत पर आधारित हुकूमतें चल रही हैं। ताजीरात -ए- इस्लामी पर बड़ी बड़ी युनिवर्सिटियों में शोद्ध किया जाता है, इस्लामिक ला के चार बुनियादी उसूल जिंदगी के हर पहलू का अहाता करते हैं।
यहां पर उस रिवायत का वर्णन उचित होगा, जिसका तअल्लुक हजरत मआज़ बिन जबल से है।
उनको अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहुअलैहि वसल्लम ने यमन का गवर्नर बनाकर भेजा था, जब वह प्रस्थान के लिए घोड़े पर सवार हो गए तो अल्लाह के रसूल कुछ दूर उनके साथ-साथ पैदल चले, और चलते-चलते उन्होंने मआज से पूछा कि तुम्हारे पास मुकदमात आएंगे तो किस प्रकार फैसला करोगे। मआज़ ने उत्तर दिया कि अल्लाह की किताब से। आपने कहा कि अगर अल्लाह की किताब में वह हुक्म न मिला तो फिर?
मआज़ ने उत्तर दिया सुन्नत-ए-रसूल और हदीसों से, आपने कहा कि अगर वहां भी न मिले तो?
मआज ने जवाब दिया कि इन दोनों की रौश्नी में क्यास करूंगा। आपने यह सुनकर खुशी का इज़हार किया और उनके सीने को थपथपा कर उनको शाबाशी दी और यमन के लिए रवाना कर दिया।
इसके अतिरिक्त इतिहासकार जानते हैं कि हुकूमतों के लिए सबसे पहला लिखित संविधान जिस पर अमल संभव है वह कुरआन व हदीस की शकल में इस्लाम ने पेश किया था जिनकी बुनियाद पर इस्लामिक ला, फिक़ा की शकल में वजूद में आया और बाद के दौर में उसके 4 स्कूल्स आफ थॉटस वजूद में आए। अर्थात हनफी, शाफई, मालकी और हंबली और अगर इसमें फिक़ा जाफरिया को शामिल कर लिया जाए तो यह पांच हो जाते हैं। आजकल अधिक इस्लामी मुलकों में फिका हनफी के मुताबिक ही अदालतें कायम हैं जबकि सऊदी अरब में हंबली और ईरान में फिक़ा जाफरिया के मुताबिक हुकूमत चलायी जाती हैं। इस्लाम की खूबी यह कि उसमें इस्लाम के ना मानने वालों के लिए भी ला मौजूद है। हैरतअंगेज़ बात यह है कि 1400 साल पहले पेशकरदा इस्लामी कानून आज के पसंदीदा तर्जे हुकूमत सेकुलरिज्म के लगभग शत प्रतिशत अनुकूल है। मसलन इस्लामी हुकूमत में गैर मुस्लिम के भी वही अधिकार हैं जो एक मुसलमान के हैं। लिहाज़ा किसी गैर मुस्लिम को कोई मुसलमान नाहक कतल कर दे तो जान के बदले जान के नियम के अनुसार ही कातिल से किसास लिया जाएगा।
इन सब बातों को जानते हुए भी अगर कोई यह कहे कि इस्लाम पूजा पद्धति मात्र है तो उसके बारे में केवल यही कहा जा सकता है कि वह इस्लामी शिक्षा से अत्यंत अनभिज्ञ है और अगर ऐसा कहने वाला यह दावा भी करे वह हाफिज व आलिम भी था तो मेरा खयाल है कि उसे किसी साईकलोजिस्ट से अपना इलाज कराना चाहिए।
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हमने पंडित जी की एक अन्य पुस्तक का वर्णन किया था पंडित जी महाराज अपनी उसी पुस्तक ‘‘वेद और कुरआन की समीक्षा’’ के पृष्ठ 10 पर लिखते हैं
‘‘लोग मेरे लेख को पढने में रूची रखते हैं कुछ आर्यसमाजियों में रवीवारीय सत्संग में मेरे लेख का पाठ होता रहा है जिसमें अनेक उल्लेखनीय लेख मेरे विभिन्न पत्रिकाओं में छपे हैं, मैं सिद्धांत पर ही लिखता हूं।’’
    और करमफरमा पंडित महाशय का सिद्धांत यह है कि स्वयं से पंक्तियाँ घड़ो और लिख डालो कि यह कुरआन में है। ऐसे सिद्धांतवादी पर अल्लाह रहम करे।
यह महाशय अपनी पुस्तक के पृष्ठ 10 पर ही आगे लिखते हैंः
‘‘आज भी तथाकथित आर्यसमाज के अधिकारी जो कहलाते हैं उन्हें भी वैदिक सिद्धांत का क ख भी नहीं मालूम’’
अर्थात वैदिक सिद्धांत तो वह है जो महेन्द्रपाल पेश कर रहे हैं कि झूठी पंक्तियां घडो और उसे कुरआन की आयत बताकर उन पर प्रश्न करके भोले-भाले और सीधे- साधे लोगों को बहकाओ, हमने किताब के आरंभ में महेंद्रपाल जी के पत्रक के पहले पृष्ठ पर उनके द्वारा लिखित पंक्ति


(पी.डी.एफ फाइल पृष्‍ठ 44 पर चित्र देखें)
अंकित की थी चलो इसी पर फैसला हो जाए। महेंद्रपाल जी ने इसे कुरआन की आयत लिखा है। अगर वह उसको कुरआन के 30 पारों में कहीं दिखादें तो वह सच्चे ठहरे। वरना आर्य समाज को बताना चाहिए कि क्या यही वैदिक सिद्धांत है? और अगर ऐसा नहीं है तो फिर बहतर होगा कि वह महेन्द्रपाल की ज़बान को स्वयं लगाम दें।
   डा. मुहम्मद असलम कासमी



वेदों के ज्ञाता महर्षि दयानंद सरस्वती ने
‘सत्यार्थ प्रकाश’ में लिखा हैः-
1. प्रसूता छह दिन के पश्चात् बच्चे को दूध न पिलावे। (2-3) (4-68)
2.  24 वर्ष की स्त्री और 48 वर्ष के पुरुष का विवाह उत्तम है अर्थात् स्वामी जी के मतानुसार लड़के की उम्र लड़की से दूना या ढाई गुना होनी चाहिए। (4-20) (14-143) (3-31)
3.  गर्भ स्थिति का निश्चय हो जाने पर एक वर्ष तक स्त्री-पुरुष का समागम नहीं होना चाहिए। (2-2) (4-65)
4.  जब पति अथवा स्त्री संतान उत्पन्न करने में असमर्थ हों तो वह पुरुष अथवा स्त्री नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकते हैं। (4-122 से 149)
5.  यज्ञ और हवन करने से वातावरण शुद्ध होता है। (4-93)
6.  मांस खाना जघन्य अपराध है। मांसाहारियों के हाथ का खाने में आर्यों  को भी यह पाप लगता है। पशुओं को मारने वालों को सब मनुष्यों की हत्या करने वाले जानिएगा। (10-11 से 25)
7.  मुर्दों को गाड़ना बुरा है क्योंकि वह सड़कर वायु को दुर्गन्धमय कर रोग फैला देते हैं। (13-41, 42)
8.  लघुशंका के पश्चात् कुछ मुत्रांश कपड़ों में न लगे, इसलिए ख़तना कराना बुरा है। (13-31)
9.  दण्ड का विधान ज्ञान और प्रतिष्ठा के आधार पर होना चाहिए। (6-27)
10. ईश्वर के न्याय में क्षणमात्र भी विलम्ब नहीं होता। (14-105)
11. ईश्वर अपने भक्तों के पाप क्षमा नहीं करता। (7-52)
12. सूर्य केवल अपनी परिधि (Axis)  पर घूमता है किसी लोक के चारों ओर ; (Orbit) नहीं घूमता। (8-71)
13. सूर्य, चन्द्र, तारे आदि पर भी मनुष्य आदि सृष्टि हैं। (8-73)
14. सिर के बाल रखने से उष्णता अधिक होती है और उससे बुद्धि कम हो  जाती है। (10-2)
जरा सोचिए ! क्या उक्त तथ्य वास्तव में बौद्धिक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक हैं ?


वेदों के ज्ञाता स्वामी दयानंद सरस्वती ने
वेदों के निर्देशन में लिखा है:-

1.  ईश्वर जगत् का निमित्त (Efficient Cause)   कारण है, उपादन कारण    (Material Cause)  नहीं है। (7-45) (8-3)
वैदिक धर्म एकेश्वरवाद का प्रतिपादन करता है और उसे सृष्टिकर्ता भी मानता है, मगर स्वामी दयानंद ने कहा कि उपादन कारण के बिना जगत् की उत्पत्ति संभव नहीं है। ईश्वर, जीव और प्रकृति तीनों अनादि हैं। ईश्वर मात्र शिल्पी है, उसने सृष्टि का विकास किया है, सृजन नहीं किया। अर्थात् जिस प्रकार कुम्भकार ने घड़ा बनाया, मिट्टी नहीं बनाई, ठीक इसी प्रकार परमेश्वर ने जगत् बनाया। प्रकृति और जीव दोनों संसाधन ;(Material) पहले से मौजूद थे।
2.  सम्पूर्ण मानवता एक माँ-बाप की संतान नहीं है। (8-51)
3.  वेद आवागमनीय पुनर्जन्म की अवधारणा का प्रतिपादन करते हैं। (9-75)
4.  मनुष्य और पशु आदि में जीव (Soul) एक सा है। (9-74)
5.  स्वर्ग, नरक का कोई अलग लोक नहीं है। (9-79)

विचार करें कि क्या वास्तव में वेद उक्त तथ्यों को प्रतिपादित करते हैं?