छुवा छूत का रोग
हालिया दिनों मैं चर्चा का विषय रहा ,यह छुवा छूत का समाचार था, खबर है कि किसी सरकारी स्कूल के बच्चों ने एक दलित महिला के हाथ का बना खाना खाने से इनकार कर दिया ,इस पर कुछ विचारकों ने अपनी अपनी टिपण्णी प्रस्तुत की , हिंदी के जाने माने लेखक डाक्टर महीप सिंह ने २२ जोलाई २०१० को ,,देनिक जागरण,, में एक गंभीर लेएतराज लेख लिखा ,उन्हों ने कई ऐसी जगहों की निशानदही की,जहाँ यह बीमारी खूब फल फूल रही हे ,और इसे रोक ने वाला कोई नहीं ,
१७ जनवरी २००९ को ,, दैनिक जागरण ,,में एक समाचार में बताया गया था कि, भूनेश्वर में परदेश की एक दलित मंत्री मंदिर से पूजा करके निकली तो ,मंदिर का शुद्धिकरण किया गया ,
इस परकार के समाचार कोई नयी बात नहीं ,यह हम आए दिन देखते और सुनते रहते हें ,और इनके विरुद्ध विद्द्वानगाणों के विचार भी पढ़ने को मिलते रहते हें ,परन्तु क्या आपने सोचा हे कि, इक्कीसवी सदी के इस आधुनिक युग में भी यह वबा हमारा पीछा क्यों नहीं छोढ़ रही हे ,तो आइये मैं आप को बताता हूँ ,,,बात असल यह हे कि यह मुद्दा उन तत्त्वों के लिए विचारणीय हे ,जो सीना तान कर कहते हें ,,, गर्व से कहो हम हिन्दू हें ,, हिन्दू होने का मतलब क्या हे , यही न कि आप उस कि विचारधारा को मानेंगे ,, और उस की विचारधारा की बुनीयाद है वर्ण व्यवस्था और यह व्यवस्था टिकी हुयी ही छुवाछूत पर हे ,,आप हिन्दू धर्म की कोई भी धर्म पुस्तक उठालें ,इतनी सफाई के साथ उस में छुवाछूत आप को मिलेगी की जिस का इंकार संभव नहीं ,मसलन ,,मनुस्मार्ती,, को लें,, उस का आरम्भ ही चार वर्णों की बात से होता हे ,फिर दूसरे अद्ध्याय के १७५ वें श्लोक में शूद्र के लिए वेद पाठ वर्जित किया गया हे ,चोथे अद्ध्याय के १८० वें श्लोक में ब्रह्मन को कहा गया हे की वः शूद्र को कोई परामर्श भी न दे ,यहाँ तक कि उसे हवन के बाद का परसाद तक देने कि मनाही हे ,पांचवे अद्ध्याय के ९५ वें श्लोक में उसकी अर्थी उस रस्ते से भी लेजाने की अनुमति नहीं हे जिस से ब्रह्मन की जाती हे ,
इस पारकर के दर्जन भर श्लोक आप को इस ,,स्मर्ति,, में मिलेंगे , जो दलित को नीच साबित कर रहे होंगे ,,
केवल म्नुस्मारती ही की बात नहीं , महाभारत, हो या ,,रामायण,,छुवाछूत और ऊँच नीच की बात सब में हे ,रामायण के नायक श्री राम ने तो शम्बूक नामी दलित का वध ही इस कारन से कर दिया था कि उस ने दलित हो कर भी जपतप करने का साहस किया था ,और राम चरित्र मानस के रचयता ने तो यहाँ तक लिख दिया कि ,,, ढोल गंवार शूद्र और नारी
यह सब हें ताडन के अधिकारी
ऐसे में प्रश्न यह हे कि आखिर छुवाछूत का यह रोग कैसे ख़त्म हो सकता हे ,,
मैं जानता हूँ कि आज कल कुछ लोग धर्म के इन आदेशों ,उपदेशों को तोड़मरोड़ कर कुछ का कुछ अर्थ बताने का पर्यास करते हें , परन्तु कोन नहीं जानता कि सच्चाई क्या हे ,,इस सच्चाई को साबित करने के लिए केवल वर्तमान की स्थिति ही पर्याप्त हे ,,,
Saturday, July 24, 2010
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lekh se poorn sahmat
ReplyDeletepoorn asahmat
ReplyDeleteतुम भी दलितगर्दी पर उतर आए
ReplyDeleteतुम जैसे आतंकवादी भी दलितवादी हो गए
ReplyDeletebad post
ReplyDeleteक़ासमी जी आप महान विचारक है
ReplyDeleteजैसी शक्ल वैसी शीरत,वैसा ही मनोविकार।
ReplyDeleteअब याद करो, उज़ाड,बंजर,रेतीली सोच ।
आपसे बहुत अधिक परिचित नहीं होते हुए भी अधिकारपूर्ण निवेदन करता हूँ की मेरे नवोदित ब्लॉग में प्रवेश कर मुझे अपना आशीर्वाद और महत्वपूर्ण मार्गदर्शन जिसकी मुझे महती आवश्यकता है प्रदान कर मेरे ब्लॉग लेखन को सार्थक बनायें......!!
ReplyDeleteआपसे बहुत अधिक परिचित नहीं होते हुए भी अधिकारपूर्ण निवेदन करता हूँ की मेरे नवोदित ब्लॉग में प्रवेश कर मुझे अपना आशीर्वाद और महत्वपूर्ण मार्गदर्शन जिसकी मुझे महती आवश्यकता है प्रदान कर मेरे ब्लॉग लेखन को सार्थक बनायें......!!
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ReplyDeletebahut bhtar
ReplyDeletekya be mulle sach hajam nahi hua jo ki comment delete kar diya?
ReplyDeletebahanchod katuve, saale tum logon mein ye sheikh, sayyad, siddiqui, qureshi, ansari ye sab kya hota hai? kisi indian mulle ke ghar koi arabi apni ladki dega kya? madharchod tum log kewal laaton ki bhasha jaante ho... abh bhi samay hai sudhar jao arna pakistan nikal lo.. yahan tumhara jehad nahi chalne wala.. agar is baar hindu bhadak gaye to tumhare allah aur muhammad ki maa bahan ek kar denge.. tum sale randiyon ki auladein is baar seedhe jannat mein apni 72 hooron ke paas pahuncha di jayengi..