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Thursday, August 23, 2012

पर्दा

लखीमपुर खीरी  के गांव लगचह में विकलांग लड़की से  बलात्कार किया गया, उननाउमें एक पिछड़े वर्ग की नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार हुआ, बलात्कार की  दूसरी  घटना बनारस में हुई जहां बलात्कार के बाद लड़की की  हत्या कर दी गई, एटा में एक 22 वर्षीय लड़की को हवस   का शिका  बनाया गया, यह समाचार दिल्ली से प्रकाशित होने वाले एक दैनिक अख़बार में लखनऊ व् आस पास  के कॉलम में दर्ज हैं, उत्तर प्रदेश में चौबीस घंटों में बलात्कार की  चार घटनाएं , यह महज संयोग नहीं है बल्कि इस तरह की खबरें आए दिन अखबारों की ज़ीनत बनती हैं, यह किसी विशेष क्षेत्र का  समाचार भी  नहीं हैं, दुनिया भर में इस तरह की घटनाओं की भरमार है, इस तरह की खबरों पर हमदरदान नामूस ,ए ज़न  घड़ियाली आँसू बहाकर  महिला के अधिकार और उनकी सुरक्षा के दुहाई  देते नज़र आते हैं, आज के माहौल में लड़कियों की  सुरक्षा एक समस्या है, सवाल यह है कि यह समस्या किस की  पैदा करदा  है? लड़को  की ? लड़कियों की ? या समाज की?,  यह सच है कि यह समस्या खुद रो नहीं है बल्कि समाज की  पैदा करदा  है, जिसमें महिलाओं की आधी आबादी बराबर की  भागीदार है, लड़किया  सुरक्षित नहीं, लड़कियों की  आबरू महफूज़  नहीं, उनकी सुरक्षा के लिए सख्त कानून बनाया जाए , यह केवल खुश नुमा नारे हैं, उनके सहारे आधी मानव आबादी को सुरक्षा प्रदान नहीं कराई जा सकती, क्योंकि सुरक्षा के लिए केवल कानून काफी नहीं होता बल्कि कानून से पहले भी कुछ होता है जिस को  को अंजाम देना ज़रूरी है, और वह है सुरक्षा उपाय अपनाना, एक ए , टी, एम मशीन के कमरे की बाहर वाली दीवार पर क्षेत्रीय पुलिस द्वारा कुछ सावधानियां सम्बन्धी  आदेश दर्ज थे, मसलन  बाईक उचित और सुरक्षित जगह पर खड़ी करें, अपनी बाइक से ग़ाफ़िल न रहें, अहतयाती दृष्टि से व्हील लॉक का उपयोग करें, सवाल यह है कि हम अपनी बाइक की रक्षा के लिए विभिन्न एहतियात करते हैं, तो आबरू  की रक्षा के लिए किया सुरक्षा उपाय आवश्यक नहीं होना चाहिए, वह सुरक्षा उपाय क्या हो सकते  है? यह एक ऐसा सवाल है जहां से संस्कृतियों का संघर्ष शुरू हो जा ता है, क्योंकि महिला की इज्जत व् नामूस  की सुरक्षा की   तदाबीर को केवल इस्लामी संस्कृति का हिस्सा माना जाता है इस्लाम कानून से जिद्दत पसंदों  चूलें  हिलने लगती हैं लिहाज़ा  वह उन्हें  फूटी आंख नहीं भाता , लेकिन गैर जानिब  दाराना विश्लेषण तो यही बताता है कि अमूल्य वस्तुओं को चोरों  की दृष्टि से बचाने के लिए एहतियात आवश्यक हैं, अगर हम युवा लड़कियों को समझा सकें कि घर से निकलते समय अपने आकर्षक चेहरे और युवाओं की भावनाओं को भड़काने वाले अंगों को छिपालें, तो आप कहेंगे  कि यह तो  पर्दा है, जो इस्लामी शिक्षा का हिस्सा है, और इसी से तो बैर है, लेकिन आख़िर क्यों? यह सवाल हम मुस्लिम और गैर मुस्लिम दोनों से पूछते हैं, क्योंकि ऐसे मुसलमानों की भी  कमी नहीं जो इस्लामी पर्दे में लड़कियों को कैदी समझते  है, कुछ दिन पहले देश के एक राष्ट्रीय कवि का यह बयान पढ़ने को मिला था कि मुस्लिम लड़कियों को परदे की ज़रूरत नहीं पर्दा  तो केवल आँखों में होना चाहीये, सवाल यह है कि पर्दे की बदौलत यदि बहन बेटियों की इज्जत और जीवन दोनों की रक्षा हो सके तो क्या  यह सस्ता सौदा नहीं है, अगर एक लड़की पर्दे के साथ  घर से निकले और अन्य कोई लड़की  अर्ध नग्न कपदोन में , तो जरा सोचिए कि अगर भगवान न करे,   दोनों का सामना किसी आवारा युवक से होता है और वह छेड़ खानी की हिम्मत करता है तो किसके साथ करेगा? वह पर्दे वाली  महिला को देखे गा  या अर्ध नग्न  को, जहां तक ​​आंखों में परदे की  बात है, तो क्या आप कह सकते हैं कि किसी सामग्री की सुरक्षा के उपाय की जरूरत नहीं, क्योंकि किसी को भी चोरी नहीं करनी चाहिए, पर्दा  आँखों में होना चाहिए भर कह देने से युवा यौन इच्छाओं और  उन की भावनाओं को कैसे ठंडा किया जा सकता है जिसका  उभार आँखों को अंधा और दिमाग को शल बना देता है, एक बात यह भी कही जाती है कि लड़कियों की इज्ज़त  पर हमला करने वालों के लिए कड़ा कानून बनाकर इस मुसीबत से निजात पाई जा सकती है, भारत के पूर्व गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने अपने शासनकाल में सुझाव दिया था कि व्यभिचार  के आरोपी को मौत की सजा दी जानी चाहिए, लेकिन केवल सख्त कानून रोग के इलाज के लिए काफी है? शायद नहीं, क्योंकि कानून केवल वहाँ काम करता है जहां पकड़े जाने की संभावना हो, लेकिन जब आप लड़कियों को बे जरूरत और बे महाबा भटकने की अनुमति देंगे तो संभव है कि ऐसे अवसर युवाओं को अधिक  उपलब्ध हों , जहां उन्हें पकड़े जाने का भय न हो और वह घटना को अंजाम देने से बाज़ न रहें , जहां तक ​​पर्दे की बात है, अगर लड़कियों को उसकी  तालीम दिजती  है, तो हम्दर्दान ए  नामूस ए  ज़न  की चाय में उबाल आ जाता है और उन्हें  लड़के और लड़की के बीच भेद  भेदभाव दिखाई देने लगता है, जबकि इस तरह का  भेदभाव प्राकृतिक है , और मानव प्रकृति का मुकाबला नहीं कर सकता, मतलब यह है कि जहां प्रकृति ने किसी मसलहत के  तहत भेदभाव से काम लिया है, उसकी गहरी खाई को पाटन  हज़रत इंसान के बस की बात नहीं है और जहां भी उसने प्रकृति से टकराने की कोशिश की है वहीं उसे  मुंह की खानी पड़ी है क्योंकि आसमान का थूका  बहरहाल मुंह पर आता है इसलिए लड़का लड़की में समानता के भूत ने भेदभाव को तो कण बराबर न मिटाया , हाँ औरत को बे आबरू जरूर कर  दिया है, अब देखिए ना अल्लाह ने महिला के शरीर की बनावट एक विशेष उद्देश्य से पुरुष से अलग बनाई है, इसके नरम नाजुक बदन में सरव्  कैसा  लचीलापन, चाँद कैसी चमक और चुंबक जैसा  आकर्षक है, उसकी आँखें उस  झील की तरह है जिसमें बड़े तैराक डूब जाते हैं, उसकी जूल्फ़ों के जाल ने ऐसी ऐसी हस्तियों का शिकार है जिन्हें अपनी शक्ति पर बड़ा गर्व था, , दूसरी ओर पुरुष है उस  बेचारे के  पास तुन्द व्  तवाना बदन को छोड़कर  धरा किया  है, उसकी अल्लड चाल, मोटे और खूसट  बाल और फककड़  आवाज़ पर कौन मरता है, लेकिन यह सब निर्माता ब्रह्मांड के रचनाकर की  योजना के अनुसार है, उसने  मानव जाति के तवातुर  को बनाए रखने के लिए एक दूसरे में  आकर्षक रखा है, और  आकर्षण की  धुरी औरत को बनाया है, इसलिए उसे यह अधिकार है कि वह खुद को अधिक से अधिक आकर्षक दिखाने के  उपकरण करे, मगर केवल उस पुरुष  के लिए जो उसके हिस्से  का हे, न यह की वह  अपने सौंदर्य बु से सारे शहर की हत्या नाहक करती फिरे, इस्लाम ने उसे केवल इसी चीज़ से रोका है, मोजूदा पर्दा जो बशकल बुर्का प्रसिद्ध है वह कुरान का मतलूब  नहीं कि कभी कभी  यह शेरवानी नुमा बुर्का खुद, निमंत्रण नज़ारा देता दिखाई पड़ता है, अल्लाह से दुआ हे कि वह महिलाओं को साद बुध्धि दे ..............धनंयवाद .......

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